
गीत के बोल
प्रिय पाहुन सिन्दूर दान करू - 2
एहि अवसर नहि लाज उचित थिक - 2
एहन ने किछु मान करू,
प्रिय पाहुन सिन्दूर दान करू - 2
लियऽ सिन्दूर कर कमल मुदित मन - 2
हमर कथा किछ कान धरू,
प्रिय पाहुन सिन्दूर दान करू - 2
लग्न मुहूर्त सुमङ्गल एखन थिक - 2
आब ने विलम्ब महान करू,
प्रिय पाहुन सिन्दूर दान करू - 2
सोन सिन्दूर हम पहिने सँ ताकल - 2
शुभ-शुभ सिन्दूर दान करू,
प्रिय पाहुन सिन्दूर दान करू - 2
दामोदर विधि आजु मुदित चित - 2
वर कन्याक कल्याण करू,
प्रिय पाहुन सिन्दूर दान करू - 3
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गाने का विवरण
मिथिला के विवाह में जब दूल्हा वधू की माँग में सिन्दूर भरने वाला होता है, तब सखियाँ और घर की महिलाएँ यह गीत गाती हैं। मिथिला में सिन्दूरदान के लिए 'भखरा सिन्दूर' का प्रयोग किया जाता है, जिसका रंग चटख लाल के बजाय गुलाबी होता है और जिसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। दूल्हा किसी स्वर्ण आभूषण की सहायता से यह सिन्दूर वधू की माँग में भरता है। यह गीत दामोदर लाल दास 'विशारद' द्वारा रचित है। गीत में दूल्हे को स्नेहपूर्वक 'पाहुन', यानी अतिथि, कहकर संबोधित किया गया है। सखियाँ उससे आग्रह करती हैं कि वह लज्जा और मान छोड़कर सिन्दूरदान की रस्म पूरी करे।वे कहती हैं, "हे प्रिय पाहुन! अपने कमल जैसे हाथों में प्रसन्न मन से सिन्दूर लीजिए और हमारी बात थोड़ी सुनिए। इस मांगलिक अवसर पर न लज्जा उचित है, न मान या हठ। विवाह का शुभ लग्न और मुहूर्त अभी है। सिन्दूर पहले से तैयार रखा है, अब विलंब न हो।" अंत में कवि कामना करते हैं कि यह विवाह-विधि प्रसन्नतापूर्वक पूरी हो और वर-कन्या का कल्याण हो।
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चलु देखु भरि नयना
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अवध नगरिया सँ
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कातिक मास बीतल सुकराती
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प्रिय पाहुन सिन्दूर दान करू
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सतरंगी संसार सँ
रजनी-पल्लवी

लिख रहल छी चिट्ठी भइया
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प्रिय पाहुन सिन्दूर दान करू

चलु देखु भरि नयना
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हे सीता माता कतेक तप केलौं
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दुअरि छेकौनी अहाँ
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भइया भउजि सँ करियौन विचार,
रजनी-पल्लवी

हम धनमा कुटैबइ एहि बड़बा सँ
रजनी-पल्लवी

आजु बाजए बधइया कोबर घर मे
रजनी-पल्लवी

हमरा अँगना मे उगि गेलइ चान
रजनी-पल्लवी

सिया के सोहाग दै लय
रजनी-पल्लवी

एहन सुन्दर मिथिला धाम
विभा झा

गीतिया मे चित्तिया
डॉ. रानी झा

आजु सोभा जनक मन्दिर
डॉ. रानी झा

जौ हम जनितहुँ
डॉ. रानी झा

धन दुल्हा रामचन्द्र धन मोरी सीता
डॉ. रानी झा

सुतल छलीयै बाबा के भवनबा मे
विभा झा

बरसा बरसे रे सबरिया
कंचन झा

गौरी पुजू जानकी जनक भवन मे
विभा झा

ऊँचा रे झरोखा
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

धीया बिनु सूना
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

मेही भात जतन भनसिआ
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

जाहि घर आहो बाबा
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

परिछनि चलियौ सखी
विभा झा

चितचोरबा आइ बन्हौलनि हे
विभा झा

सुनू सखिया हे
विभा झा

चलु गौरी पूजन फुलवारी
कंचन झा

बाबा के अँगना
विभा झा

यौ दुल्हा चिन्ही लियौ
विभा झा

बेरी-बेरी बरजहुँ
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

समधि के हम गारि नइ दैय छी
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

घर पछुअरबामे
विभा झा

परिछी कोई ले रे
कंचन झा

