हाथ में पान के पत्ते, सुपारी और सिक्का — मिथिला में भैया दूज का अनुष्ठान
हाथ में पान के पत्ते, सुपारी और सिक्का — मिथिला में भैया दूज का अनुष्ठान

गीत के बोल

लिख रहल छी चिट्ठी भइया,
भरदुतिआ मे आयब यौ - 2
लिख रहल छी चिट्ठी भइया,
भरदुतिआ मे आयब यौ - 2
पूरी दही आओर पिड़िकिआ,
संग सनेस मे लायब यौ ।
भरदुतिआ मे आयब यौ ...

नीन्द उचटि गेल आइ खुशी मे,
कोइली बजलइ जखने सँ ।
नीन्द उचटि गेल आइ खुशी मे,
कोइली बजलइ जखने सँ ।
भोरे अँगना निप पिठारऽ,
देलियइ अरिपन तखने सँ ।
रहि-रहि ताकी बाट अहाँ के - 2
देखि दौड़ि कऽ जायब यौ ।
भरदुतिआ मे आयब यौ ...
लिख रहल छी चिट्ठी भइया,
भरदुतिआ मे आयब यौ - 2

मानि रहल छी देव मनौती,
भइया हमर अओता जौ ।
मानि रहल छी देव मनौती,
भइया हमर अओता जौ ।
चढ़ा देब हम लड्डू पेड़ा,
झुमका हमर लओता जौ ।
आयब नइ जँ सत्य कहइ छी - 2
आयब तऽ नइ बाजब यौ ।
भरदुतिआ मे आयब यौ ...
लिख रहल छी चिट्ठी भइया,
भरदुतिआ मे आयब यौ - 2

पड़ि गेल साँझ आब नहि अयला,
केहन हमर छल भरदुतिआ ।
पड़ि गेल साँझ आब नहि अयला,
केहन हमर छल भरदुतिआ ।
धइले रहि गेल सबटा ओहिना,
पूरी तिलकोरक तरुआ ।
आयब नइ जँ सत्य कहइ छी - 2
आइ नइ किछु हम खायब यौ ।
भरदुतिआ मे आयब यौ ...
लिख रहल छी चिट्ठी भइया,
भरदुतिआ मे आयब यौ - 2
पूरी दही आओर पिड़िकिआ,
संग सनेस मे लायब यौ ।
भरदुतिआ मे आयब यौ - 3

पूरे बोल देखें

गाने का विवरण

भरदुतिया मिथिला का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो भाई-बहन के स्नेह को समर्पित है। इस दिन बहन अपने भाई की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना करती है। यह मिथिला गीत भाई-बहन के स्नेह की भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। इसमें बहन अपने भाई को चिट्ठी लिखकर आग्रह करती है, “भैया, इस भरदुतिया पर आपको जरूर आना है।” वह प्यार भरे अधिकार से अपनी पसंद का सनेस, पूरी, दही और पिड़िकिआ, भी मांगती है। भाई के आने की खुशी में उसकी नींद उड़ जाती है। कोयल की आवाज़ सुनते ही वह उठकर आँगन लीपती है और पिठार से सुंदर अरिपन बनाती है। वह बार-बार रास्ते की ओर निहारती है, मानो भैया अभी आते ही होंगे। वह देवताओं से प्रार्थना करती है, “मेरे भैया को सही-सलामत भेज दो,” और मनौती मानती है कि उनके आने पर लड्डू-पेड़ा चढ़ाएगी। साथ ही, वह उम्मीद करती है कि भैया उसके लिए झुमका लाएँगे, और प्यार से कहती है कि अगर वे नहीं आए तो वह उनसे बात नहीं करेगी। लेकिन दिन ढल जाता है और भाई नहीं आता। बहन का मन टूट जाता है। उसके बनाए पकवान, पूरी और तिलकोरक तरुआ (एक पारंपरिक पकवान), वैसे ही पड़े रह जाते हैं। अंत में वह निराश होकर कहती है कि अगर भैया नहीं आए, तो आज वह भी कुछ नहीं खाएगी।

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