Sunrise light refelcting off beautiful traditional red stone columns

हमारे बारे में

खमाज भारत की लोक धुनों को सुनता, संजोता और आगे बढ़ाता है - जैसी वे गूंजती हैं लोगों की आवाज़ों में, दैनिक जीवन के संस्कारों में, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आती कहानियों में।

Sunrise light refelcting off beautiful traditional red stone columns

हमारे बारे में

खमाज भारत की लोक धुनों को सुनता, संजोता और आगे बढ़ाता है - जैसी वे गूंजती हैं लोगों की आवाज़ों में, दैनिक जीवन के संस्कारों में, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आती कहानियों में।

हम कौन हैं

खमाज की शुरुआत एक छोटी-सी इच्छा से हुई

लोकसंगीत की आत्मा को ज़िंदा रखने की। धूल भरे संग्रहालयों में नहीं, बल्कि रोज़ की प्लेलिस्ट में, रात की गुनगुनाहट में, दोस्तों के साथ बैठकों में।

लोकसंगीत की आत्मा को ज़िंदा रखने की। धूल भरे संग्रहालयों में नहीं, बल्कि रोज़ की प्लेलिस्ट में, रात की गुनगुनाहट में, दोस्तों के साथ बैठकों में।

लोकसंगीत की आत्मा को ज़िंदा रखने की। धूल भरे संग्रहालयों में नहीं, बल्कि रोज़ की प्लेलिस्ट में, रात की गुनगुनाहट में, दोस्तों के साथ बैठकों में।

हमारा सपना है भारत के अनमोल लोकसंगीत का ऐसा डिजिटल ठिकाना बनाना, जहाँ गीत सिर्फ़ सहेजे ही न जाएँ, बल्कि गूँजें। हम हर गीत को उसकी भूमि की असली धुन में रिकॉर्ड करना चाहते हैं—बोलों को ध्यान से संजोकर और उन्हें सहज व सम्मानजनक तरीके से दुनिया तक पहुँचाकर। ख़ास तौर पर, हम उन समुदायों और गायकों को मंच देना चाहते हैं जो अक्सर वंचित रह जाते हैं।

हर गीत के साथ उसकी कहानी भी है—कब गाते हैं, क्यों गाते हैं, कैसे गाते हैं। शादी की खुशी हो या बारिश का इंतज़ार, काम की थकान हो या त्योहार का उल्लास—हर मौके का अपना संगीत है। बस यही तो चाहिए लोकसंगीत को सच में जीने और समझने के लिए।

हमारा सपना है भारत के अनमोल लोकसंगीत का ऐसा डिजिटल ठिकाना बनाना, जहाँ गीत सिर्फ़ सहेजे ही न जाएँ, बल्कि गूँजें। हम हर गीत को उसकी भूमि की असली धुन में रिकॉर्ड करना चाहते हैं—बोलों को ध्यान से संजोकर और उन्हें सहज व सम्मानजनक तरीके से दुनिया तक पहुँचाकर। ख़ास तौर पर, हम उन समुदायों और गायकों को मंच देना चाहते हैं जो अक्सर वंचित रह जाते हैं।

हर गीत के साथ उसकी कहानी भी है—कब गाते हैं, क्यों गाते हैं, कैसे गाते हैं। शादी की खुशी हो या बारिश का इंतज़ार, काम की थकान हो या त्योहार का उल्लास—हर मौके का अपना संगीत है। बस यही तो चाहिए लोकसंगीत को सच में जीने और समझने के लिए।

हमारा सपना है भारत के अनमोल लोकसंगीत का ऐसा डिजिटल ठिकाना बनाना, जहाँ गीत सिर्फ़ सहेजे ही न जाएँ, बल्कि गूँजें। हम हर गीत को उसकी भूमि की असली धुन में रिकॉर्ड करना चाहते हैं—बोलों को ध्यान से संजोकर और उन्हें सहज व सम्मानजनक तरीके से दुनिया तक पहुँचाकर। ख़ास तौर पर, हम उन समुदायों और गायकों को मंच देना चाहते हैं जो अक्सर वंचित रह जाते हैं।

हर गीत के साथ उसकी कहानी भी है—कब गाते हैं, क्यों गाते हैं, कैसे गाते हैं। शादी की खुशी हो या बारिश का इंतज़ार, काम की थकान हो या त्योहार का उल्लास—हर मौके का अपना संगीत है। बस यही तो चाहिए लोकसंगीत को सच में जीने और समझने के लिए।

खमाज का सार

Mithila Painting of two people contently leaning on each other's heads
Mithila Painting of two people contently leaning on each other's heads
Mithila Painting of two people contently leaning on each other's heads

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में, खमाज केवल एक राग नहीं है बल्कि यह उन थाटों या मूल स्वर-संरचनाओं में से एक है, जिनसे अनेक मधुर राग उत्पन्न हुए हैं। कई लोकप्रिय राग जैसे देश, झिंझोटी, तिलक कामोद और स्वयं खमाज की उत्पत्ति इसी थाट से हुई है।

खमाज को क्षुद्र प्रकृति का राग कहते हैं। मतलब यह कि यह उन भारी-भरकम रागों जैसा नहीं जो सिर्फ बड़े उस्तादों के बस की बात हो। खमाज तो घर-आँगन का राग है—सहज, मिठास भरा, दिल को छू जाने वाला। ठुमरी हो या लोकगीत, भजन हो या कजरी— इन सब का राग है खमाज ।

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में, खमाज केवल एक राग नहीं है बल्कि यह उन थाटों या मूल स्वर-संरचनाओं में से एक है, जिनसे अनेक मधुर राग उत्पन्न हुए हैं। कई लोकप्रिय राग जैसे देश, झिंझोटी, तिलक कामोद और स्वयं खमाज की उत्पत्ति इसी थाट से हुई है।


खमाज को क्षुद्र प्रकृति का राग कहते हैं। मतलब यह कि यह उन भारी-भरकम रागों जैसा नहीं जो सिर्फ बड़े उस्तादों के बस की बात हो। खमाज तो घर-आँगन का राग है—सहज, मिठास भरा, दिल को छू जाने वाला। ठुमरी हो या लोकगीत, भजन हो या कजरी— इन सब का राग है खमाज ।


खमाज की तरह हमारी यह संस्था भी वैसी ही है—अपनापन लिए, जमीन से जुड़ी , हर आवाज़ को जगह देने वाली। लोरी गाती माँ हो या श्रमजीवीमजदूर,  बिरहा गाती सजनी हो या निर्गुण गाता फकीर  —यहाँ हर संगीत के लिए जगह है।

खमाज की तरह हमारी यह संस्था भी वैसी ही है—अपनापन लिए, जमीन से जुड़ी , हर आवाज़ को जगह देने वाली।

लोरी गाती माँ हो या श्रमजीवी मजदूर, बिरहा गाती सजनी हो या निर्गुण गाता फकीर — यहाँ हर संगीत के लिए जगह है। संगीत उन अगम्य भावनाओं को संज्ञा प्रदान करता है जिन्हें हम बया नहीं कर सकते, और उन सत्यों को स्वर देता है जिन्हें समाज मूक करने का प्रयास करता है। लोकगीत ही वह माध्यम है जिससे समुदाय अपनी गाथाएँ संजोते हैं और व्यक्ति अपनी आत्मा की वाणी पाते हैं। खमाज के जरिये हम इस सांस्कृतिक धरोहर को संजोना चाहते हैं—हर गीत में, हर कहानी में, हर आवाज़ में।

जटिलता का सम्मान

Mithila Style painting of a woman dressed traditionally and playing a music instrument in nature
Mithila Style painting of a woman dressed traditionally and playing a music instrument in nature
Mithila Style painting of a woman dressed traditionally and playing a music instrument in nature

हम इस बात से अवगत हैं कि लोक कला और परंपराएं, समृद्ध और मनमोहक होने के साथ-साथ, अपने समय की सामाजिक वास्तविकताओं को भी दर्शाती हैं—जिनमें कभी-कभी लैंगिक रूढ़िवादिता, हाशियाकरण, और संरचनात्मक असमानताएं शामिल हैं। इन गीतों में पीढ़ियों की खुशियाँ, दुख और अनकही बातें छिपी हैं—कई बार जो आवाज़ें सुनाई नहीं देतीं, वही सबसे तेज़ होती हैं।

खमाज में हमारा काम है गीतों को उनके असली रूप में रिकॉर्ड करना—बिना किसी बदलाव के, ताकि उनकी सच्चाई और संदर्भ सुरक्षित रहें। साथ ही हम

हम इस बात से अवगत हैं कि लोक कला और परंपराएं, समृद्ध और मनमोहक होने के साथ-साथ, अपने समय की सामाजिक वास्तविकताओं को भी दर्शाती हैं—जिनमें कभी-कभी लैंगिक रूढ़िवादिता, हाशियाकरण, और संरचनात्मक असमानताएं शामिल हैं। इन गीतों में पीढ़ियों की खुशियाँ, दुख और अनकही बातें छिपी हैं—कई बार जो आवाज़ें सुनाई नहीं देतीं, वही सबसे तेज़ होती हैं।

खमाज में हमारा काम है गीतों को उनके असली रूप में रिकॉर्ड करना—बिना किसी बदलाव के, ताकि उनकी सच्चाई और संदर्भ सुरक्षित रहें। साथ ही हम

हम उन गायकों और समुदायों को मंच देने के लिए प्रतिबद्ध हैं जिनकी आवाज लंबे समय से अनसुनी रही है।

हमारे लिए ज़रूरी है कि इन जटिल पहलुओं को ईमानदारी और सम्मान के साथ सामने लाया जाए।

हमारी प्रक्रिया

खमाज पर प्रस्तुत होने वाला हर गीत एक लम्बी खोज, गहन शोध और अनेक संगीत-प्रेमियों की निष्ठा का परिणाम है।

Indian folk singer playing harmonium as accompaniment to folk singing
Indian folk singer playing harmonium as accompaniment to folk singing
Indian folk singer playing harmonium as accompaniment to folk singing

हमारे लोग

हम कुछ संगीत प्रेमी हैं, जो अपनी धरोहर के प्रति जिग्यासु हैं, और उन गीतों से ख़ास लगाव रखते हैं जो गांव में बिताये बचपन के दिनों की ओर मन को बरबस खींच ले जाते हैं ।

Photo of Geetanjali Jha Chakraborty who is the Founder of Khamaaj
Photo of Geetanjali Jha Chakraborty who is the Founder of Khamaaj

गीतांजलि झा चक्रबोर्ती

गीतांजलि झा चक्रबोर्ती

संस्थापक एवं क्रिएटिव लीड

संस्थापक एवं क्रिएटिव लीड

गीतांजलि झा चक्रबोर्ती खमाज की संस्थापक हैं, जहाँ वे भारत के लोकसंगीत के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक डिजिटल मंच बना रही हैं। वे खमाज को एक “जीवित अभिलेखागार” के रूप में देखती हैं, जो गीतों, अनुष्ठानों और कहानियों को एक साथ जोड़ता है। साथ ही उन महिलाओं तथा वंचित समुदायों की आवाज़ों को सामने लाता है जिनकी संगीत परंपराएँ अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। सामाजिक क्षेत्र में दो दशकों से अधिक के अनुभव के साथ, गीतांजलि ने कई संस्थाओं के विकास और रूपांतरण के चरणों में सफलतापूर्वक नेतृत्व किया है, जैसे भारत की अग्रणी बाल संरक्षण सेवा — चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन — और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुधार के लिए कार्यरत संस्था — अरमान (ARMMAN)। वे वर्तमान में अप्नालय (शहरी गरीबी उन्मूलन), विहान और मिसिंग लिंक ट्रस्ट (मानव तस्करी विरोधी कार्य), तथा टीएनएस इंडिया फाउंडेशन (युवा कौशल विकास) जैसी संस्थाओं के बोर्ड में कार्यरत हैं। वे मिशन-प्रेरित संस्थाओं को कार्यक्रम विकसित करने, विकास की दिशा तय करने, और सुरक्षित व समावेशी कार्य-संस्कृति को बढ़ावा देने में सहयोग प्रदान करती हैं। गीतांजलि ने सामाजिक कार्य में एम.ए. और मानवाधिकारों में एल.एल.एम. की उपाधि प्राप्त की है तथा संगीत-चिकित्सा में प्रमाणित हैं। मिथिला की लोकपरंपराओं में पली-बढ़ी और रवीन्द्र संगीत में प्रशिक्षित, वे संगीत के प्रति अपने गहरे जुड़ाव को समानता, समावेशन और सांस्कृतिक संरक्षण के अपने आजीवन संकल्प से जोड़ते हुए खमाज को आकार दे रही हैं।

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गीतांजलि झा चक्रबोर्ती खमाज की संस्थापक हैं, जहाँ वे भारत के लोकसंगीत के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक डिजिटल मंच बना रही हैं। वे खमाज को एक “जीवित अभिलेखागार” के रूप में देखती हैं, जो गीतों, अनुष्ठानों और कहानियों को एक साथ जोड़ता है। साथ ही उन महिलाओं तथा वंचित समुदायों की आवाज़ों को सामने लाता है जिनकी संगीत परंपराएँ अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। सामाजिक क्षेत्र में दो दशकों से अधिक के अनुभव के साथ, गीतांजलि ने कई संस्थाओं के विकास और रूपांतरण के चरणों में सफलतापूर्वक नेतृत्व किया है, जैसे भारत की अग्रणी बाल संरक्षण सेवा — चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन — और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुधार के लिए कार्यरत संस्था — अरमान (ARMMAN)। वे वर्तमान में अप्नालय (शहरी गरीबी उन्मूलन), विहान और मिसिंग लिंक ट्रस्ट (मानव तस्करी विरोधी कार्य), तथा टीएनएस इंडिया फाउंडेशन (युवा कौशल विकास) जैसी संस्थाओं के बोर्ड में कार्यरत हैं। वे मिशन-प्रेरित संस्थाओं को कार्यक्रम विकसित करने, विकास की दिशा तय करने, और सुरक्षित व समावेशी कार्य-संस्कृति को बढ़ावा देने में सहयोग प्रदान करती हैं। गीतांजलि ने सामाजिक कार्य में एम.ए. और मानवाधिकारों में एल.एल.एम. की उपाधि प्राप्त की है तथा संगीत-चिकित्सा में प्रमाणित हैं। मिथिला की लोकपरंपराओं में पली-बढ़ी और रवीन्द्र संगीत में प्रशिक्षित, वे संगीत के प्रति अपने गहरे जुड़ाव को समानता, समावेशन और सांस्कृतिक संरक्षण के अपने आजीवन संकल्प से जोड़ते हुए खमाज को आकार दे रही हैं।

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गीतांजलि झा चक्रबोर्ती खमाज की संस्थापक हैं, जहाँ वे भारत के लोकसंगीत के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक डिजिटल मंच बना रही हैं। वे खमाज को एक “जीवित अभिलेखागार” के रूप में देखती हैं, जो गीतों, अनुष्ठानों और कहानियों को एक साथ जोड़ता है। साथ ही उन महिलाओं तथा वंचित समुदायों की आवाज़ों को सामने लाता है जिनकी संगीत परंपराएँ अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। सामाजिक क्षेत्र में दो दशकों से अधिक के अनुभव के साथ, गीतांजलि ने कई संस्थाओं के विकास और रूपांतरण के चरणों में सफलतापूर्वक नेतृत्व किया है, जैसे भारत की अग्रणी बाल संरक्षण सेवा — चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन — और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुधार के लिए कार्यरत संस्था — अरमान (ARMMAN)। वे वर्तमान में अप्नालय (शहरी गरीबी उन्मूलन), विहान और मिसिंग लिंक ट्रस्ट (मानव तस्करी विरोधी कार्य), तथा टीएनएस इंडिया फाउंडेशन (युवा कौशल विकास) जैसी संस्थाओं के बोर्ड में कार्यरत हैं। वे मिशन-प्रेरित संस्थाओं को कार्यक्रम विकसित करने, विकास की दिशा तय करने, और सुरक्षित व समावेशी कार्य-संस्कृति को बढ़ावा देने में सहयोग प्रदान करती हैं। गीतांजलि ने सामाजिक कार्य में एम.ए. और मानवाधिकारों में एल.एल.एम. की उपाधि प्राप्त की है तथा संगीत-चिकित्सा में प्रमाणित हैं। मिथिला की लोकपरंपराओं में पली-बढ़ी और रवीन्द्र संगीत में प्रशिक्षित, वे संगीत के प्रति अपने गहरे जुड़ाव को समानता, समावेशन और सांस्कृतिक संरक्षण के अपने आजीवन संकल्प से जोड़ते हुए खमाज को आकार दे रही हैं।

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Photo of Sanchayan Chakraborty, Co founder of Khamaaj
Photo of Sanchayan Chakraborty, Co founder of Khamaaj

संचयन चक्रबोर्ती

संचयन चक्रबोर्ती

संचयन चक्रबोर्ती

संस्थापक सह

संस्थापक सह

संचयन ने संगीत के प्रति अपने आजीवन प्रेम और सकारात्मक बदलाव लाने वाले व्यवसायों को बनाने की इच्छा को एक साथ जोड़ते हुए खमाज की सह-स्थापना की। कॉलेज बैंड के दिनों से ही संगीत के अनुरागी रहे संचयन की रुचियाँ विविध हैं—क्लासिक रॉक से लेकर भारतीय शास्त्रीय संगीत, रवीन्द्र संगीत और लोकधुनों तक—सब उन्हें समान रूप से भाते हैं। वे रणनीतिक दृष्टिकोण से खमाज की दिशा तय करते हैं, जिससे यह उत्पाद, बाज़ार और वित्त की जटिलताओं को सहजता से समझ सके। एक अग्रणी वैश्विक इम्पैक्ट इन्वेस्टिंग फर्म में पार्टनर के रूप में, संचयन अपनी कॉर्पोरेट रणनीति और वित्तीय बाज़ार की विशेषज्ञता का उपयोग ऐसे नवोदित उद्यमों में निवेश करने और उन्हें विकसित करने में करते हैं, जो निम्न-आय वर्ग की ज़िंदगियों पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। कई स्टार्टअप बोर्डों में उनकी भूमिका ने उन्हें संस्थापकों को पूँजी रणनीति से लेकर परिचालन उत्कृष्टता तक की जटिल चुनौतियों में मार्गदर्शन देने का गहरा अनुभव दिया है। अपने वर्तमान कार्य से पहले उन्होंने भारत और मध्य पूर्व की प्रमुख इन्वेस्टमेंट बैंकों में दो दशकों तक कार्य किया। आईआईएम बेंगलुरु और आईआईटी खड़गपुर के पूर्व छात्र संचयन यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि खमाज की नींव उतनी ही मज़बूत हो जितनी उस संगीत की, जिसे यह संरक्षित करने का प्रयास कर रहा है।

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संचयन ने संगीत के प्रति अपने आजीवन प्रेम और सकारात्मक बदलाव लाने वाले व्यवसायों को बनाने की इच्छा को एक साथ जोड़ते हुए खमाज की सह-स्थापना की। कॉलेज बैंड के दिनों से ही संगीत के अनुरागी रहे संचयन की रुचियाँ विविध हैं—क्लासिक रॉक से लेकर भारतीय शास्त्रीय संगीत, रवीन्द्र संगीत और लोकधुनों तक—सब उन्हें समान रूप से भाते हैं। वे रणनीतिक दृष्टिकोण से खमाज की दिशा तय करते हैं, जिससे यह उत्पाद, बाज़ार और वित्त की जटिलताओं को सहजता से समझ सके। एक अग्रणी वैश्विक इम्पैक्ट इन्वेस्टिंग फर्म में पार्टनर के रूप में, संचयन अपनी कॉर्पोरेट रणनीति और वित्तीय बाज़ार की विशेषज्ञता का उपयोग ऐसे नवोदित उद्यमों में निवेश करने और उन्हें विकसित करने में करते हैं, जो निम्न-आय वर्ग की ज़िंदगियों पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। कई स्टार्टअप बोर्डों में उनकी भूमिका ने उन्हें संस्थापकों को पूँजी रणनीति से लेकर परिचालन उत्कृष्टता तक की जटिल चुनौतियों में मार्गदर्शन देने का गहरा अनुभव दिया है। अपने वर्तमान कार्य से पहले उन्होंने भारत और मध्य पूर्व की प्रमुख इन्वेस्टमेंट बैंकों में दो दशकों तक कार्य किया। आईआईएम बेंगलुरु और आईआईटी खड़गपुर के पूर्व छात्र संचयन यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि खमाज की नींव उतनी ही मज़बूत हो जितनी उस संगीत की, जिसे यह संरक्षित करने का प्रयास कर रहा है।

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संचयन ने संगीत के प्रति अपने आजीवन प्रेम और सकारात्मक बदलाव लाने वाले व्यवसायों को बनाने की इच्छा को एक साथ जोड़ते हुए खमाज की सह-स्थापना की। कॉलेज बैंड के दिनों से ही संगीत के अनुरागी रहे संचयन की रुचियाँ विविध हैं—क्लासिक रॉक से लेकर भारतीय शास्त्रीय संगीत, रवीन्द्र संगीत और लोकधुनों तक—सब उन्हें समान रूप से भाते हैं। वे रणनीतिक दृष्टिकोण से खमाज की दिशा तय करते हैं, जिससे यह उत्पाद, बाज़ार और वित्त की जटिलताओं को सहजता से समझ सके। एक अग्रणी वैश्विक इम्पैक्ट इन्वेस्टिंग फर्म में पार्टनर के रूप में, संचयन अपनी कॉर्पोरेट रणनीति और वित्तीय बाज़ार की विशेषज्ञता का उपयोग ऐसे नवोदित उद्यमों में निवेश करने और उन्हें विकसित करने में करते हैं, जो निम्न-आय वर्ग की ज़िंदगियों पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। कई स्टार्टअप बोर्डों में उनकी भूमिका ने उन्हें संस्थापकों को पूँजी रणनीति से लेकर परिचालन उत्कृष्टता तक की जटिल चुनौतियों में मार्गदर्शन देने का गहरा अनुभव दिया है। अपने वर्तमान कार्य से पहले उन्होंने भारत और मध्य पूर्व की प्रमुख इन्वेस्टमेंट बैंकों में दो दशकों तक कार्य किया। आईआईएम बेंगलुरु और आईआईटी खड़गपुर के पूर्व छात्र संचयन यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि खमाज की नींव उतनी ही मज़बूत हो जितनी उस संगीत की, जिसे यह संरक्षित करने का प्रयास कर रहा है।

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मार्गदर्शक

लोकसंगीत, भाषाविज्ञान, सांस्कृतिक इतिहास और अभिलेखन के विशेषज्ञों का एक समूह हमारा मार्गदर्शन करता है। उनके सहयोग से हमारा कार्य प्रामाणिक, सटीक तथा परंपराओं के प्रति सम्मानपूर्ण बना रहता है।

Photo of Dr. Bina Thakur, advisor for Khamaaj and contemporary writers of Maithili literature
Photo of Dr. Bina Thakur, advisor for Khamaaj and contemporary writers of Maithili literature

डॉ. बीना ठाकुर

डॉ. बीना ठाकुर

डॉ. बीना ठाकुर मैथिली साहित्य की प्रमुख समकालीन लेखिकाओं में से एक हैं। उनके कहानी संग्रह परिणिता के लिए उन्हें 2018 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे स्त्री अनुभव, सामाजिक यथार्थ और मिथिला के सांस्कृतिक परिदृश्य को गहरी संवेदनशीलता और स्वाभाविकता के साथ चित्रित करती हैं। 19 मार्च, 1954 को मधुबनी जिले के भवानीपुर गाँव में जन्मीं डॉ. ठाकुर प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. श्रीमोहन ठाकुर की पुत्री हैं। उन्होंने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के मैथिली विभाग में वरिष्ठ प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किया है। एक शिक्षिका और शोधविद् के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों की कई पीढ़ियों को दिशा दी है। वर्तमान में वे साहित्य अकादमी की जनरल काउंसिल की मेम्बर हैं। वे भारतीय ज्ञानपीठ में मैथिली भाषा की कन्वीनर और के. के. बिड़ला फाउंडेशन में सरस्वती सम्मान की भाषा समिति की कन्वीनर भी हैं। पिछले एक दशक में, वे साहित्य अकादमी, दिल्ली से विभिन्न क्षमताओं में जुड़ी रही हैं, जैसे की कन्वीनर और बोर्ड मेम्बर । उन्होंने शिक्षा मंत्रालय की भारत वाणी परियोजना के लिए मैथिली भाषा की एडिटोरियल कमिटी में भी सेवा की है। अब तक, डॉ. ठाकुर ने 31 पुस्तकों का लेखन, संपादन और आलोचना की है। उनकी प्रमुख रचनाओं में उपन्यास भारती; कहानी संग्रह आलाप और परिणिता; तथा आलोचनात्मक अध्ययन जैसे मैथिली रामकाव्यक परम्परा, विद्यापतिक उत्स, इतिहास दर्पण, वाणिनी, और मैथिली गीत-साहित्यक विकास ओ परम्परा शामिल हैं। संपादन के क्षेत्र में, उन्होंने विद्यापति गीत रत्नावली, मैथिली प्रबंध काव्यक उद्भव ओ विकास, और शोध पत्रिका मैथिली सहित 17 प्रकाशन निकाले हैं। उन्होंने हिंदी से मैथिली में हाट-बाजार और आधुनिक भारतीय कविता संचयन जैसी अनेक कृतियों का अनुवाद भी किया है। उनके योगदान को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें उनकी पुस्तक भारती के लिए नागार्जुन पुरस्कार, अपराजिता सम्मान, मैथिली पुनर्जागरण प्रकाश लेखकिया सम्मान, मिथिला विभूति सम्मान, पंडित चंदा झा राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान, जागरण शिक्षा सम्मान और कई अन्य पुरस्कार शामिल हैं। डॉ. ठाकुर का लेखन शैक्षणिक गहराई को काव्यात्मक अभिव्यक्ति और मानवीय संवेदना के साथ सहजता से मिश्रित करता है। अपनी रचनात्मक और आलोचनात्मक कृतियों के माध्यम से, वे मिथिला की साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर को नई जीवंतता और पहचान प्रदान करती रहती हैं।

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डॉ. बीना ठाकुर मैथिली साहित्य की प्रमुख समकालीन लेखिकाओं में से एक हैं। उनके कहानी संग्रह परिणिता के लिए उन्हें 2018 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे स्त्री अनुभव, सामाजिक यथार्थ और मिथिला के सांस्कृतिक परिदृश्य को गहरी संवेदनशीलता और स्वाभाविकता के साथ चित्रित करती हैं। 19 मार्च, 1954 को मधुबनी जिले के भवानीपुर गाँव में जन्मीं डॉ. ठाकुर प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. श्रीमोहन ठाकुर की पुत्री हैं। उन्होंने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के मैथिली विभाग में वरिष्ठ प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किया है। एक शिक्षिका और शोधविद् के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों की कई पीढ़ियों को दिशा दी है। वर्तमान में वे साहित्य अकादमी की जनरल काउंसिल की मेम्बर हैं। वे भारतीय ज्ञानपीठ में मैथिली भाषा की कन्वीनर और के. के. बिड़ला फाउंडेशन में सरस्वती सम्मान की भाषा समिति की कन्वीनर भी हैं। पिछले एक दशक में, वे साहित्य अकादमी, दिल्ली से विभिन्न क्षमताओं में जुड़ी रही हैं, जैसे की कन्वीनर और बोर्ड मेम्बर । उन्होंने शिक्षा मंत्रालय की भारत वाणी परियोजना के लिए मैथिली भाषा की एडिटोरियल कमिटी में भी सेवा की है। अब तक, डॉ. ठाकुर ने 31 पुस्तकों का लेखन, संपादन और आलोचना की है। उनकी प्रमुख रचनाओं में उपन्यास भारती; कहानी संग्रह आलाप और परिणिता; तथा आलोचनात्मक अध्ययन जैसे मैथिली रामकाव्यक परम्परा, विद्यापतिक उत्स, इतिहास दर्पण, वाणिनी, और मैथिली गीत-साहित्यक विकास ओ परम्परा शामिल हैं। संपादन के क्षेत्र में, उन्होंने विद्यापति गीत रत्नावली, मैथिली प्रबंध काव्यक उद्भव ओ विकास, और शोध पत्रिका मैथिली सहित 17 प्रकाशन निकाले हैं। उन्होंने हिंदी से मैथिली में हाट-बाजार और आधुनिक भारतीय कविता संचयन जैसी अनेक कृतियों का अनुवाद भी किया है। उनके योगदान को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें उनकी पुस्तक भारती के लिए नागार्जुन पुरस्कार, अपराजिता सम्मान, मैथिली पुनर्जागरण प्रकाश लेखकिया सम्मान, मिथिला विभूति सम्मान, पंडित चंदा झा राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान, जागरण शिक्षा सम्मान और कई अन्य पुरस्कार शामिल हैं। डॉ. ठाकुर का लेखन शैक्षणिक गहराई को काव्यात्मक अभिव्यक्ति और मानवीय संवेदना के साथ सहजता से मिश्रित करता है। अपनी रचनात्मक और आलोचनात्मक कृतियों के माध्यम से, वे मिथिला की साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर को नई जीवंतता और पहचान प्रदान करती रहती हैं।

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डॉ. बीना ठाकुर मैथिली साहित्य की प्रमुख समकालीन लेखिकाओं में से एक हैं। उनके कहानी संग्रह परिणिता के लिए उन्हें 2018 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अपनी रचनाओं के माध्यम से वे स्त्री अनुभव, सामाजिक यथार्थ और मिथिला के सांस्कृतिक परिदृश्य को गहरी संवेदनशीलता और स्वाभाविकता के साथ चित्रित करती हैं। 19 मार्च, 1954 को मधुबनी जिले के भवानीपुर गाँव में जन्मीं डॉ. ठाकुर प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. श्रीमोहन ठाकुर की पुत्री हैं। उन्होंने ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के मैथिली विभाग में वरिष्ठ प्राध्यापिका और विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किया है। एक शिक्षिका और शोधविद् के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों की कई पीढ़ियों को दिशा दी है। वर्तमान में वे साहित्य अकादमी की जनरल काउंसिल की मेम्बर हैं। वे भारतीय ज्ञानपीठ में मैथिली भाषा की कन्वीनर और के. के. बिड़ला फाउंडेशन में सरस्वती सम्मान की भाषा समिति की कन्वीनर भी हैं। पिछले एक दशक में, वे साहित्य अकादमी, दिल्ली से विभिन्न क्षमताओं में जुड़ी रही हैं, जैसे की कन्वीनर और बोर्ड मेम्बर । उन्होंने शिक्षा मंत्रालय की भारत वाणी परियोजना के लिए मैथिली भाषा की एडिटोरियल कमिटी में भी सेवा की है। अब तक, डॉ. ठाकुर ने 31 पुस्तकों का लेखन, संपादन और आलोचना की है। उनकी प्रमुख रचनाओं में उपन्यास भारती; कहानी संग्रह आलाप और परिणिता; तथा आलोचनात्मक अध्ययन जैसे मैथिली रामकाव्यक परम्परा, विद्यापतिक उत्स, इतिहास दर्पण, वाणिनी, और मैथिली गीत-साहित्यक विकास ओ परम्परा शामिल हैं। संपादन के क्षेत्र में, उन्होंने विद्यापति गीत रत्नावली, मैथिली प्रबंध काव्यक उद्भव ओ विकास, और शोध पत्रिका मैथिली सहित 17 प्रकाशन निकाले हैं। उन्होंने हिंदी से मैथिली में हाट-बाजार और आधुनिक भारतीय कविता संचयन जैसी अनेक कृतियों का अनुवाद भी किया है। उनके योगदान को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें उनकी पुस्तक भारती के लिए नागार्जुन पुरस्कार, अपराजिता सम्मान, मैथिली पुनर्जागरण प्रकाश लेखकिया सम्मान, मिथिला विभूति सम्मान, पंडित चंदा झा राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान, जागरण शिक्षा सम्मान और कई अन्य पुरस्कार शामिल हैं। डॉ. ठाकुर का लेखन शैक्षणिक गहराई को काव्यात्मक अभिव्यक्ति और मानवीय संवेदना के साथ सहजता से मिश्रित करता है। अपनी रचनात्मक और आलोचनात्मक कृतियों के माध्यम से, वे मिथिला की साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर को नई जीवंतता और पहचान प्रदान करती रहती हैं।

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Photo of Dr. Shiv Prasad Yadav, advisor for Khamaaj
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प्रो. (डॉ.) शिव प्रसाद यादव

प्रो. (डॉ.) शिव प्रसाद यादव

प्रो. (डॉ.) शिव प्रसाद यादव का जन्म 31 जनवरी 1960 को बिहार के सुपौल ज़िले के देवीपुर गाँव में हुआ। वे तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय अंतर्गत अंगीभूत इकाई,मारवाड़ी महाविद्यालय, भागलपुर में मैथिली विभाग के प्राचार्य और विभागाध्यक्ष रहे हैं। अब वे सेवा-निवृत्त होकर भी मैथिली भाषा, साहित्य और लोकसंस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय हैं। डॉ. यादव गम्भीर अध्येता, लोकगाथा के अन्वेषक, कुशल अनुवादक, सफल संपादक, धैर्यवान समीक्षक और संवेदनशील कवि हैं। उनके लेखन और शोध का मूल उद्देश्य लोकपरंपरा, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता को अकादमिक विमर्श में प्रतिष्ठित करना रहा है। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘युग प्रभा’ (कविता संग्रह, शेखर प्रकाशन, पटना, 2014), ‘मैथिली दलित लोकगाथा और संस्कृति आलोचना’ (संपादित, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2015), ‘ई राजधानी’ (अनूदित कथा संग्रह, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2012) और ज्योति महागाथा (साहित्य अकादमी २०१९) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्होंने ‘मालिनी’ एवं ‘मिथि मालिनी’ जैसी प्रतिष्ठित मैथिली पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। अब तक उनके 35 से अधिक शोध-निबंध चेतना समिति (पटना), साहित्य अकादेमी (नई दिल्ली) और अन्य प्रतिष्ठित प्रकाशनों में प्रकाशित हो चुके हैं। वे चेतना समिति, पटना; कर्णगोष्ठी, कोलकाता; और मिथिला परिषद, भागलपुर के आजीवन सदस्य हैं तथा मैथिली अकादमी, पटना के पूर्व सदस्य भी रह चुके हैं।

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प्रो. (डॉ.) शिव प्रसाद यादव का जन्म 31 जनवरी 1960 को बिहार के सुपौल ज़िले के देवीपुर गाँव में हुआ। वे तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय अंतर्गत अंगीभूत इकाई,मारवाड़ी महाविद्यालय, भागलपुर में मैथिली विभाग के प्राचार्य और विभागाध्यक्ष रहे हैं। अब वे सेवा-निवृत्त होकर भी मैथिली भाषा, साहित्य और लोकसंस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय हैं। डॉ. यादव गम्भीर अध्येता, लोकगाथा के अन्वेषक, कुशल अनुवादक, सफल संपादक, धैर्यवान समीक्षक और संवेदनशील कवि हैं। उनके लेखन और शोध का मूल उद्देश्य लोकपरंपरा, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता को अकादमिक विमर्श में प्रतिष्ठित करना रहा है। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘युग प्रभा’ (कविता संग्रह, शेखर प्रकाशन, पटना, 2014), ‘मैथिली दलित लोकगाथा और संस्कृति आलोचना’ (संपादित, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2015), ‘ई राजधानी’ (अनूदित कथा संग्रह, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2012) और ज्योति महागाथा (साहित्य अकादमी २०१९) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्होंने ‘मालिनी’ एवं ‘मिथि मालिनी’ जैसी प्रतिष्ठित मैथिली पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। अब तक उनके 35 से अधिक शोध-निबंध चेतना समिति (पटना), साहित्य अकादेमी (नई दिल्ली) और अन्य प्रतिष्ठित प्रकाशनों में प्रकाशित हो चुके हैं। वे चेतना समिति, पटना; कर्णगोष्ठी, कोलकाता; और मिथिला परिषद, भागलपुर के आजीवन सदस्य हैं तथा मैथिली अकादमी, पटना के पूर्व सदस्य भी रह चुके हैं।

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प्रो. (डॉ.) शिव प्रसाद यादव का जन्म 31 जनवरी 1960 को बिहार के सुपौल ज़िले के देवीपुर गाँव में हुआ। वे तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय अंतर्गत अंगीभूत इकाई,मारवाड़ी महाविद्यालय, भागलपुर में मैथिली विभाग के प्राचार्य और विभागाध्यक्ष रहे हैं। अब वे सेवा-निवृत्त होकर भी मैथिली भाषा, साहित्य और लोकसंस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय हैं। डॉ. यादव गम्भीर अध्येता, लोकगाथा के अन्वेषक, कुशल अनुवादक, सफल संपादक, धैर्यवान समीक्षक और संवेदनशील कवि हैं। उनके लेखन और शोध का मूल उद्देश्य लोकपरंपरा, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता को अकादमिक विमर्श में प्रतिष्ठित करना रहा है। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘युग प्रभा’ (कविता संग्रह, शेखर प्रकाशन, पटना, 2014), ‘मैथिली दलित लोकगाथा और संस्कृति आलोचना’ (संपादित, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2015), ‘ई राजधानी’ (अनूदित कथा संग्रह, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2012) और ज्योति महागाथा (साहित्य अकादमी २०१९) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्होंने ‘मालिनी’ एवं ‘मिथि मालिनी’ जैसी प्रतिष्ठित मैथिली पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। अब तक उनके 35 से अधिक शोध-निबंध चेतना समिति (पटना), साहित्य अकादेमी (नई दिल्ली) और अन्य प्रतिष्ठित प्रकाशनों में प्रकाशित हो चुके हैं। वे चेतना समिति, पटना; कर्णगोष्ठी, कोलकाता; और मिथिला परिषद, भागलपुर के आजीवन सदस्य हैं तथा मैथिली अकादमी, पटना के पूर्व सदस्य भी रह चुके हैं।

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Photo of Dr. Mahendra Narayan Ram, advisor for Khamaaj
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डॉ. महेन्द्र नारायण राम

डॉ. महेन्द्र नारायण राम

डॉ. महेन्द्र नारायण राम बिहार के एक सम्मानित लोकसाहित्यकार, लेखक और सांस्कृतिक इतिहासकार हैं, जो मिथिला क्षेत्र की मौखिक परंपराओं, लोक साहित्य और जीवन्त इतिहास के गहरे अध्ययन के लिए व्यापक रूप से जाने जाते हैं। फील्डवर्क और साहित्यिक विश्लेषण दोनों में गहरी जानकारी रखने वाले डॉ. राम ने दर्जनों पुस्तकों की रचना की है और कई संकलनों का संपादन एवं उनमें योगदान भी किया है। उनकी प्रमुख कृतियों में कारिख लोकगाथा, सलहेश लोकगाथा, भाओ भगैत गहबर गीत, दिनाभद्री लोकगाथा, दुसाध जाति का विस्तृत इतिहास, मैथिली लोकवृत्त: बिंदु और विस्तार, लोक काव्य कुसुम, दामिनी, मैथिली लोक-साहित्यक इतिहास, मनतोडिया,लोकाञ्जन, दलित दर्शन, मिथिलाक संघर्ष दूत: डा.बैद्यनाथ चौधरी'बैजू', जेना जनलियनि, लोक संदर्भ, लोक दर्शन, भारतीय संस्कृति मे जातीय जीवन आदि शामिल हैं। उनकी कहानियाँ, कविताएँ और निबंध नियमित रूप से विभिन्न पत्रिकाओं और शैक्षणिक शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। वे मैथिली अकादमी के अध्यक्ष रह चुके हैं, साहित्य अकादमी के सदस्य रहे हैं, और कई सरकारी व गैर-सरकारी संस्थानों में प्रतिष्ठित पदों पर कार्य कर चुके हैं। डॉ. राम को मिथिला विभूति, मैथिलश्री, मिथिला शिरोमणि, और मिथिला रत्न जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है। वे भारत में लोक ज्ञान और दलित साहित्यिक परंपराओं के संरक्षण के क्षेत्र में एक अग्रणी स्वर बने हुए हैं।

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डॉ. महेन्द्र नारायण राम बिहार के एक सम्मानित लोकसाहित्यकार, लेखक और सांस्कृतिक इतिहासकार हैं, जो मिथिला क्षेत्र की मौखिक परंपराओं, लोक साहित्य और जीवन्त इतिहास के गहरे अध्ययन के लिए व्यापक रूप से जाने जाते हैं। फील्डवर्क और साहित्यिक विश्लेषण दोनों में गहरी जानकारी रखने वाले डॉ. राम ने दर्जनों पुस्तकों की रचना की है और कई संकलनों का संपादन एवं उनमें योगदान भी किया है। उनकी प्रमुख कृतियों में कारिख लोकगाथा, सलहेश लोकगाथा, भाओ भगैत गहबर गीत, दिनाभद्री लोकगाथा, दुसाध जाति का विस्तृत इतिहास, मैथिली लोकवृत्त: बिंदु और विस्तार, लोक काव्य कुसुम, दामिनी, मैथिली लोक-साहित्यक इतिहास, मनतोडिया,लोकाञ्जन, दलित दर्शन, मिथिलाक संघर्ष दूत: डा.बैद्यनाथ चौधरी'बैजू', जेना जनलियनि, लोक संदर्भ, लोक दर्शन, भारतीय संस्कृति मे जातीय जीवन आदि शामिल हैं। उनकी कहानियाँ, कविताएँ और निबंध नियमित रूप से विभिन्न पत्रिकाओं और शैक्षणिक शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। वे मैथिली अकादमी के अध्यक्ष रह चुके हैं, साहित्य अकादमी के सदस्य रहे हैं, और कई सरकारी व गैर-सरकारी संस्थानों में प्रतिष्ठित पदों पर कार्य कर चुके हैं। डॉ. राम को मिथिला विभूति, मैथिलश्री, मिथिला शिरोमणि, और मिथिला रत्न जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है। वे भारत में लोक ज्ञान और दलित साहित्यिक परंपराओं के संरक्षण के क्षेत्र में एक अग्रणी स्वर बने हुए हैं।

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डॉ. महेन्द्र नारायण राम बिहार के एक सम्मानित लोकसाहित्यकार, लेखक और सांस्कृतिक इतिहासकार हैं, जो मिथिला क्षेत्र की मौखिक परंपराओं, लोक साहित्य और जीवन्त इतिहास के गहरे अध्ययन के लिए व्यापक रूप से जाने जाते हैं। फील्डवर्क और साहित्यिक विश्लेषण दोनों में गहरी जानकारी रखने वाले डॉ. राम ने दर्जनों पुस्तकों की रचना की है और कई संकलनों का संपादन एवं उनमें योगदान भी किया है। उनकी प्रमुख कृतियों में कारिख लोकगाथा, सलहेश लोकगाथा, भाओ भगैत गहबर गीत, दिनाभद्री लोकगाथा, दुसाध जाति का विस्तृत इतिहास, मैथिली लोकवृत्त: बिंदु और विस्तार, लोक काव्य कुसुम, दामिनी, मैथिली लोक-साहित्यक इतिहास, मनतोडिया,लोकाञ्जन, दलित दर्शन, मिथिलाक संघर्ष दूत: डा.बैद्यनाथ चौधरी'बैजू', जेना जनलियनि, लोक संदर्भ, लोक दर्शन, भारतीय संस्कृति मे जातीय जीवन आदि शामिल हैं। उनकी कहानियाँ, कविताएँ और निबंध नियमित रूप से विभिन्न पत्रिकाओं और शैक्षणिक शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। वे मैथिली अकादमी के अध्यक्ष रह चुके हैं, साहित्य अकादमी के सदस्य रहे हैं, और कई सरकारी व गैर-सरकारी संस्थानों में प्रतिष्ठित पदों पर कार्य कर चुके हैं। डॉ. राम को मिथिला विभूति, मैथिलश्री, मिथिला शिरोमणि, और मिथिला रत्न जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है। वे भारत में लोक ज्ञान और दलित साहित्यिक परंपराओं के संरक्षण के क्षेत्र में एक अग्रणी स्वर बने हुए हैं।

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Photo of Dr Kailash Kumar Mishra, advisor for Khamaaj
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डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र का जन्म 8 फरवरी 1967 को हुआ। वे लोकजीवन, जनसंस्कृति, कला और मानवाधिकार के क्षेत्र में सक्रिय एक प्रतिष्ठित सामाजिक मानवविज्ञानी (Social Anthropologist) हैं। उनकी शैक्षणिक योग्यताओं में पीएच.डी. (सामाजिक मानव विज्ञान), एम.ए. (मानवाधिकार), तथा डिप्लोमा (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एवं आर्ट एप्रिसिएशन) शामिल हैं। डॉ. मिश्र ने देश–विदेश की कई महत्वपूर्ण संस्थाओं और परियोजनाओं के साथ अनुसंधान कार्य किया है। वे साउथ–साउथ सॉलिडैरिटी (कनाडा), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), में रिसर्च ऑफिसर के रूप में कार्य कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त, डॉ. मिश्र ने यूनेस्को, यूएनडीपी, रीड ग्लोबल, ललित कला अकादमी, तथा मैथिली–भोजपुरी अकादमी (दिल्ली सरकार) जैसी संस्थाओं के साथ अनेक सांस्कृतिक एवं नीतिगत परियोजनाओं पर कार्य किया है। उन्हें विश्व बैंक (IPPS), गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, और रोड कनेक्ट जैसी संस्थाओं से भी जुड़कर कार्य करने का अनुभव है, जहाँ वे संस्थापक निदेशक के रूप में योगदान दे चुके हैं। उनका कार्यक्षेत्र भारतीय आदिवासी समाज, लोकजीवन, लोककला, पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति, और मानवाधिकार अध्ययन से गहराई से जुड़ा रहा है। उन्होंने भारत की विविध जनजातीय और लोक परंपराओं पर गहन अध्ययन किया है। डॉ. मिश्र “फोल्कब्रेन” नामक संस्था के संस्थापक निदेशक हैं, जिसके माध्यम से वे भारत की विविध लोक–संस्कृतियों और सृजनशील परंपराओं को संकलित, संरक्षित और प्रोत्साहित करने के साथ–साथ लोक कलाकारों और समुदायों को ज्ञान, संवाद और आजीविका के नए अवसर प्रदान करने के लिए समर्पित हैं।

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डॉ. कैलाश कुमार मिश्र का जन्म 8 फरवरी 1967 को हुआ। वे लोकजीवन, जनसंस्कृति, कला और मानवाधिकार के क्षेत्र में सक्रिय एक प्रतिष्ठित सामाजिक मानवविज्ञानी (Social Anthropologist) हैं। उनकी शैक्षणिक योग्यताओं में पीएच.डी. (सामाजिक मानव विज्ञान), एम.ए. (मानवाधिकार), तथा डिप्लोमा (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एवं आर्ट एप्रिसिएशन) शामिल हैं। डॉ. मिश्र ने देश–विदेश की कई महत्वपूर्ण संस्थाओं और परियोजनाओं के साथ अनुसंधान कार्य किया है। वे साउथ–साउथ सॉलिडैरिटी (कनाडा), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), में रिसर्च ऑफिसर के रूप में कार्य कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त, डॉ. मिश्र ने यूनेस्को, यूएनडीपी, रीड ग्लोबल, ललित कला अकादमी, तथा मैथिली–भोजपुरी अकादमी (दिल्ली सरकार) जैसी संस्थाओं के साथ अनेक सांस्कृतिक एवं नीतिगत परियोजनाओं पर कार्य किया है। उन्हें विश्व बैंक (IPPS), गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, और रोड कनेक्ट जैसी संस्थाओं से भी जुड़कर कार्य करने का अनुभव है, जहाँ वे संस्थापक निदेशक के रूप में योगदान दे चुके हैं। उनका कार्यक्षेत्र भारतीय आदिवासी समाज, लोकजीवन, लोककला, पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति, और मानवाधिकार अध्ययन से गहराई से जुड़ा रहा है। उन्होंने भारत की विविध जनजातीय और लोक परंपराओं पर गहन अध्ययन किया है। डॉ. मिश्र “फोल्कब्रेन” नामक संस्था के संस्थापक निदेशक हैं, जिसके माध्यम से वे भारत की विविध लोक–संस्कृतियों और सृजनशील परंपराओं को संकलित, संरक्षित और प्रोत्साहित करने के साथ–साथ लोक कलाकारों और समुदायों को ज्ञान, संवाद और आजीविका के नए अवसर प्रदान करने के लिए समर्पित हैं।

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डॉ. कैलाश कुमार मिश्र का जन्म 8 फरवरी 1967 को हुआ। वे लोकजीवन, जनसंस्कृति, कला और मानवाधिकार के क्षेत्र में सक्रिय एक प्रतिष्ठित सामाजिक मानवविज्ञानी (Social Anthropologist) हैं। उनकी शैक्षणिक योग्यताओं में पीएच.डी. (सामाजिक मानव विज्ञान), एम.ए. (मानवाधिकार), तथा डिप्लोमा (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एवं आर्ट एप्रिसिएशन) शामिल हैं। डॉ. मिश्र ने देश–विदेश की कई महत्वपूर्ण संस्थाओं और परियोजनाओं के साथ अनुसंधान कार्य किया है। वे साउथ–साउथ सॉलिडैरिटी (कनाडा), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), में रिसर्च ऑफिसर के रूप में कार्य कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त, डॉ. मिश्र ने यूनेस्को, यूएनडीपी, रीड ग्लोबल, ललित कला अकादमी, तथा मैथिली–भोजपुरी अकादमी (दिल्ली सरकार) जैसी संस्थाओं के साथ अनेक सांस्कृतिक एवं नीतिगत परियोजनाओं पर कार्य किया है। उन्हें विश्व बैंक (IPPS), गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, और रोड कनेक्ट जैसी संस्थाओं से भी जुड़कर कार्य करने का अनुभव है, जहाँ वे संस्थापक निदेशक के रूप में योगदान दे चुके हैं। उनका कार्यक्षेत्र भारतीय आदिवासी समाज, लोकजीवन, लोककला, पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति, और मानवाधिकार अध्ययन से गहराई से जुड़ा रहा है। उन्होंने भारत की विविध जनजातीय और लोक परंपराओं पर गहन अध्ययन किया है। डॉ. मिश्र “फोल्कब्रेन” नामक संस्था के संस्थापक निदेशक हैं, जिसके माध्यम से वे भारत की विविध लोक–संस्कृतियों और सृजनशील परंपराओं को संकलित, संरक्षित और प्रोत्साहित करने के साथ–साथ लोक कलाकारों और समुदायों को ज्ञान, संवाद और आजीविका के नए अवसर प्रदान करने के लिए समर्पित हैं।

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