
गीत के बोल
गाम के अधिकारी तोहें फलां भइया हे - 2
भैया हाथ दस पोखरि खुनाय दिअ,
चम्पा फूल लगाय दिअ हे।
भैया हाथ दस पोखरि खुनाय दिअ,
चम्पा फूल लगाय दिअ हे।
भइया लोढ़ल फूल भउजो हार गाँथू हे,
भउजो हार गांथू हे।
आहे सेहो हार पहिरथु फलां बहिनो,
साम-चकेबा खेल करू हे।
आहे सेहो हार पहिरथु फलां बहिनो,
साम-चकेबा खेल करू हे।
कहँमा बछाएब वन तितिर हे,
वन तितिर हे।
आहे कहँमा बझाएब राजा हंस,
चकेबा बहिनो खेल करू हे।
आहे कहँमा बझाएब राजा हंस,
चकेबा बहिनो खेल करू हे।
जाले बझाएब वन तितिर हे,
वन तितिर हे।
जाले बझाएब वन तितिर हे,
वन तितिर हे।
आहे बकुली बझाएब राजा हंस,
चकेबा बहिनो खेल करू हे।
आहे बकुली बझाएब राजा हंस,
चकेबा बहिनो खेल करू हे।
गाम के अधिकारी तोहें फलां भइया हे - 2
भैया हाथ दस पोखरि खुनाय दिअ,
चम्पा फूल लगाय दिअ हे।
भैया हाथ दस पोखरि खुनाय दिअ,
चम्पा फूल लगाय दिअ हे - 3
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गाने का विवरण
सामा-चकेवा मिथिला का एक लोकपर्व है, जो कार्तिक शुक्ल पंचमी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। यह भगवान श्रीकृष्ण की पुत्री सामा की कथा पर आधारित है, जिन्हें झूठे आरोप में पक्षी बनने का श्राप मिला। सत्य जानने पर उनके पति चकेवा ने भी पक्षी रूप धारण कर लिया। सामा के भाई सांभ की भक्ति से दोनों को पुनः मानव रूप प्राप्त हुआ। यह गीत उसी पर्व से जुड़ा है। बहन अपने भाई की प्रशंसा करते हुए कहती है, "हे भैया! आप तो इस गाँव के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। मेरे खेल के लिए दस हाथ गहरा एक पोखर खुदवा दीजिए और उसके किनारे चम्पा के फूल लगवा दीजिए।" सामा-चकेवा के खेल में मिट्टी की पक्षी-मूर्तियाँ बनाई जाती हैं, जिन्हें पर्व के अंत में पोखर में विसर्जित किया जाता है। वह अपने भाई से फूल लाने और भाभी से उन फूलों का एक सुंदर हार पिरोने के लिए कहती है, जिसे पहनकर वह सामा-चकेवा का खेल खेलेगी। इसके बाद बहन पूछती है, "वन के तीतर को कैसे पकड़ेंगे और राज हंस को कैसे?" फिर वह स्वयं उत्तर देती है, "तीतर को जाल से पकड़ेंगे और राज हंस को बकुली से।" पक्षियों की यह कल्पना सामा-चकेवा के दौरान बनाई जाने वाली मिट्टी की पक्षी-मूर्तियों और इस खेल के प्रतीकात्मक संसार से जुड़ी है।
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