
गीत के बोल
कातिक मास बीतल सुकराती,
करब छठिक ओरिआन ।
माइ हे! हमर मनोरथ अहीं जनइ छी,
करबइ दुखक निदान ।
छठि मइया! हमर मनोरथ अहीं जनइ छी।
करबइ दुखक निदान ।
सभहक दुख हरइ छी हे मइया!
महिमा अहाँक अपार ।
हमहुँ कर जोड़ि करइ छी,
अहीं छी जगत आधार ।
माइ हे! निर्धन दीन दुखी अवला छी,
छी हम निःसन्तान ।
छठि मइया! हमर मनोरथ अहीं जनइ छी।
करबइ दुखक निदान ।
अरघ लेल हम घाट सजैबइ,
अरिपन सिनूर पिठार ।
ठकुआ भुसबा पूरी पिड़िकिया, कुसिआ आ कुरबार ।
माइ हे! आरती के ओरिआन केने छी, धूप-दीप पकबान ।
छठि मइया! हमर मनोरथ अहीं जनइ छी।
करबइ दुखक निदान ।
एहि संसारक शक्ति सूर्य छथि,
दूर करथि अन्हार ।
इनकर बहिन दयालु मइया,
जग के तारणहार ।
माइ हे! तीनू लोकक कष्ट हरइ छी, जग मे अहींक गुणगान ।
छठि मइया! हमर मनोरथ अहीं जनइ छी।
करबइ दुखक निदान ।
हे छठि मइया! हमर मनोरथ अहीं जनइ छी।
करबइ दुखक निदान ।
पूरे बोल देखें
गाने का विवरण
यह एक छठ गीत है, जो छठ पूजा के दौरान गाया जाता है। यह चार दिवसीय पर्व भाई दूज के तीन दिन बाद आरंभ होता है और कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मुख्य पूजा के साथ संपन्न होता है। छठ गीतों में महिलाओं की भावनाएँ, उनके जीवन की सामाजिक वास्तविकताएँ, पीड़ा, आकांक्षाएँ और परिवार के कल्याण की कामनाएँ व्यक्त होती हैं। इस गीत के ज़रिए एक महिला छठी मैया से अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना कर रही है। वह कहती है, "हे माँ, सुकराती बीत गई है और अब मैंने छठ पूजा की तैयारी शुरू कर दी है। मेरे मन की इच्छा आपसे छिपी नहीं है। आप सबके दुख हरती हैं; मेरे कष्ट का भी निवारण कीजिए। मैं निर्धन, दीन और दुखी हूँ, और मेरी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि मैं निःसंतान हूँ।" "अर्घ्य देने के लिए मैं घाट सजाऊँगी, अरिपन बनाऊँगी और सिन्दूर-पिठार से पूजा करूँगी। प्रसाद में ठकुआ, भुसबा और अन्य पारंपरिक पकवान अर्पित करूँगी। धूप, दीप और आरती, सब कुछ तैयार है।" वह प्रार्थना करती है, "सूर्य देव इस संसार को शक्ति देते हैं और अंधकार दूर करते हैं। आप उनकी दयालु बहन हैं, जो पूरी सृष्टि की रक्षा और पालन करती हैं। तीनों लोकों में आपकी महिमा का गुणगान होता है। हे माँ, मेरे कष्ट दूर कीजिए और मेरे मन की कामना पूर्ण कीजिए।"
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