गीत के बोल
सुतल छलीयै बाबा के भवनबा मे,
बाबा के भवनबा मे ।
अचके मे आयल कहार - 2
कियो जे कानथि रंग-महल मे,
रंग-महल मे ।
कियो जे कानथि दलान - 2
अम्मा जे कानथि रंग-महल मे,
रंग-महल मे ।
बाबा जे कानथि दलान - 2
कियो जे कानथि मिथिला नगरिया,
मिथिला नगरिया ।
किनका के हृदय कठोर - 2
सखी सभ कानथि मिथिला नगरिया,
मिथिला नगरिया ।
भउजो के हृदय कठोर - 2
राम सपत दए पिता के बुझाएब,
पिता के बुझाएब ।
हमरा सपत दए माय - 2
सखी सभ हिली-मिली माय के बुझेबनि,
माय के बुझेबनि ….
सभ बेटी सासुर जाय - 4
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गाने का विवरण
समदाउन गीत मिथिला में विदाई के समय गाया जाता है, जब बेटी अपने मायके को छोड़कर ससुराल जाती है। समदाउन गीतों में माँ-बाप की व्याकुलता, सखियों का ढाढ़स बंधाना और बेटी के मन का बिछोह बेहद मार्मिक ढंग से व्यक्त होता है। पूरे वातावरण में विदाई का दर्द, कठोर से कठोर ह्रदय को पसीज देता है। इस गीत का सार यह समदाउन गीत उस पल को चित्रित करता है जब दुल्हन प्रस्थान के लिए तैयार है और घर के हर कोने में उसके जाने का एहसास गूंज रहा है। गीत में दुल्हन कहती हैं की मैं अनजान सी बाबा के भवन में सो रही थीं और अचानक कहार (डोली उठाने वाले) मुझे ससुराल ले जाने आ पहुंचे। विदाई की घड़ी में कोई दालान में रो रहा हैं तो कोई आँगन में । मैं राम की कसम दे पिता को दिलासा देती हूँ और खुद की कसम दे माँ को । अंत में सखियाँ माँ को समझाती हैं कि हर बेटी को ससुराल जाना होता है, यही समाज का नियम है।
और गाने
विभा झा

दरदी सजना
विभा झा

मुदा छन मे
विभा झा

एहन सुन्दर मिथिला धाम
विभा झा

यौ नारद कतए बुझा हम कहलौं
विभा झा

हम छी सीता
विभा झा

एहि बाटे भोला गेला
विभा झा

जखने बधइया माँगऽ
विभा झा

सुतल छलीयै बाबा के भवनबा मे
विभा झा

हम नइ जीयब बिनु राम
विभा झा

गौरी पुजू जानकी जनक भवन मे
विभा झा
ऐसे और गाने
सुतल छलीयै बाबा के भवनबा मे

चलु देखु भरि नयना
रजनी-पल्लवी

अवध नगरिया सँ
रजनी-पल्लवी

प्रिय पाहुन सिन्दूर दान करू
रजनी-पल्लवी

हे सीता माता कतेक तप केलौं
रजनी-पल्लवी

दुअरि छेकौनी अहाँ
रजनी-पल्लवी

भइया भउजि सँ करियौन विचार,
रजनी-पल्लवी

हम धनमा कुटैबइ एहि बड़बा सँ
रजनी-पल्लवी

आजु बाजए बधइया कोबर घर मे
रजनी-पल्लवी

हमरा अँगना मे उगि गेलइ चान
रजनी-पल्लवी

सिया के सोहाग दै लय
रजनी-पल्लवी

एहन सुन्दर मिथिला धाम
विभा झा

गीतिया मे चित्तिया
डॉ. रानी झा

आजु सोभा जनक मन्दिर
डॉ. रानी झा

जौ हम जनितहुँ
डॉ. रानी झा

धन दुल्हा रामचन्द्र धन मोरी सीता
डॉ. रानी झा

बरसा बरसे रे सबरिया
कंचन झा

गौरी पुजू जानकी जनक भवन मे
विभा झा

ऊँचा रे झरोखा
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

धीया बिनु सूना
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

मेही भात जतन भनसिआ
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

जाहि घर आहो बाबा
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

परिछनि चलियौ सखी
विभा झा

चितचोरबा आइ बन्हौलनि हे
विभा झा

सुनू सखिया हे
विभा झा

चलु गौरी पूजन फुलवारी
कंचन झा

बाबा के अँगना
विभा झा

यौ दुल्हा चिन्ही लियौ
विभा झा

बेरी-बेरी बरजहुँ
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

समधि के हम गारि नइ दैय छी
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

घर पछुअरबामे
विभा झा

परिछी कोई ले रे
कंचन झा

