
मिथिला में विवाह सबसे जीवंत और हर्षोल्लास से भरा संस्कार है। मिथिला में इसकी शुरुआत सिद्धांत से होती है जब वर और कन्या पक्ष मिलकर विवाह की तिथि और शर्तें तय करते हैं, और द्विरागमन पर पूर्ण होती है—जब वधू पहली बार ससुराल जाती है।
आज भी विवाह पारंपरिक रीति से मनाया जाता है। परिछन, कोहबर, डहकन और समदौन जैसे अनेक गीत गाए जाते हैं, जबकि कोजगरा और मधुश्रावणी जैसे पर्व विवाह के पहले वर्ष को और भी उल्लासपूर्ण बना देते हैं।
गीतों में
विवाह

चलु देखु भरि नयना
रजनी-पल्लवी

अवध नगरिया सँ
रजनी-पल्लवी

प्रिय पाहुन सिन्दूर दान करू
रजनी-पल्लवी

हे सीता माता कतेक तप केलौं
रजनी-पल्लवी

दुअरि छेकौनी अहाँ
रजनी-पल्लवी

भइया भउजि सँ करियौन विचार,
रजनी-पल्लवी

हम धनमा कुटैबइ एहि बड़बा सँ
रजनी-पल्लवी

आजु बाजए बधइया कोबर घर मे
रजनी-पल्लवी


