
गीत के बोल
आ रे जौ हम जनितहुँ धिया जएति सासुर,
धिया जएति सासुर रोपीतहुँ चानन के गाछ ।
आ रे चाननक छाँहे-छाँहे धिया मोरा जएतथि,
धिया मोरा जएतथि लागि तए शीतल बसात ।
आ रे चलल कहरिया से बिजुबन हे सखिया,
बिजुबन हे सखिया जहाँ नहि माए-बाप ।
आ रे बिनु रे अम्मा केर धिया कोना रहति,
धिया कोना रहति छने-छने उठथि चेहाय ।
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गाने का विवरण
समदाउन गीत मिथिला में विदाई के समय गाया जाता है, जब बेटी अपने मायके को छोड़कर ससुराल जाती है। ऐसे गीत माता-पिता की व्यथा और बेटी के बिछोह को इस तरह उजागर करते हैं कि कठोर से कठोर हृदय भी पिघल उठता है।इस समदाउन गीत में माँ अपनी बेटी के प्रस्थान पर अपनी पीड़ा व्यक्त करती है। वह कहती है कि यदि पहले से पता होता कि बेटी को मायका छोड़कर जाना होगा, तो वह आँगन में चन्दन का पेड़ लगाती, ताकि उसकी शीतल छाया विदाई के सफर में बेटी का साथ दे पाती। अब जब कहार दुल्हन को उस घर ले जा रहे हैं जहाँ माता-पिता साथ नहीं होंगे, बेटी की व्यथा की कल्पना से माँ का अपना हृदय भी भारी हो उठता है।
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हम धनमा कुटैबइ एहि बड़बा सँ
रजनी-पल्लवी

आजु बाजए बधइया कोबर घर मे
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रजनी-पल्लवी

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धीया बिनु सूना
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

मेही भात जतन भनसिआ
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

जाहि घर आहो बाबा
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

परिछनि चलियौ सखी
विभा झा

चितचोरबा आइ बन्हौलनि हे
विभा झा

सुनू सखिया हे
विभा झा

चलु गौरी पूजन फुलवारी
कंचन झा

बाबा के अँगना
विभा झा

यौ दुल्हा चिन्ही लियौ
विभा झा

बेरी-बेरी बरजहुँ
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

समधि के हम गारि नइ दैय छी
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

घर पछुअरबामे
विभा झा

परिछी कोई ले रे
कंचन झा

