
गीत के बोल
आ रे गीतिया मे चित्तिया,
लगओले रे जोगिया - 2
प्रीत छोड़ौने चलि जाइ,
आ रे जखन जमइया लाल,
घर सँ बाहर भेल - 2
सासु मुख पड़ल उदास,
आ रे एहन जमइया लाल के,
जाहियो नै दितहुँ,
जाइयो नै दितहुँ,
रखितहुँ हृदय लगाइ ।
आ रे जखन जमइया लाल,
आँगन सँ बाहर भेल - 2
सरहोजि मुख पड़ल उदास ।
आ रे एहन ननदोसिया के,
जाइयो नै दितहुँ - 2
रखितहुँ पान खुआइ ।
आ रे जखन जमइया लाल,
आँगन सँ बाहर भेल,
ड्योढ़ी सँ बाहर भेल,
धिया मोन पड़ल उदास ।
आ रे एहन निर्मोहिया संगे,
प्रीतो नै जोड़ितहुँ - 2
प्रीत छोड़ौने चलि जाइ ।
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गाने का विवरण
मिथिला में उदासी गीत उस समय गाए जाते हैं जब दूल्हा अपने ससुराल से विदा लेता है। विवाह के बाद वधू तुरंत मायके से विदा नहीं होती, बल्कि दूल्हा कुछ दिन ससुराल में रहकर अपने सास–ससुर, साले–ननद और अन्य परिजनों से आत्मीय संबंध बना लेता है। जब उसके प्रस्थान का क्षण आता है तो घर का हर मन भारी हो उठता है और यह करुण रस से भरे गीत उस सामूहिक वेदना का स्वाभाविक स्वर बन जाते हैं। यह विशेष गीत दूल्हे के प्रस्थान से उत्पन्न घर-परिवार के हर सदस्य की व्यथा और उससे उबरने के उनके कोमल प्रयासों का भावपूर्ण चित्रण करता है। स्वयं वधू कहती है कि काश उसने इस निर्मोही से प्रेम ही न किया होता, तो बिछोह का यह क्षण सहना आसान होता।
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रजनी-पल्लवी

हम धनमा कुटैबइ एहि बड़बा सँ
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जौ हम जनितहुँ
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गौरी पुजू जानकी जनक भवन मे
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धीया बिनु सूना
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मेही भात जतन भनसिआ
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जाहि घर आहो बाबा
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

परिछनि चलियौ सखी
विभा झा

चितचोरबा आइ बन्हौलनि हे
विभा झा

सुनू सखिया हे
विभा झा

चलु गौरी पूजन फुलवारी
कंचन झा

बाबा के अँगना
विभा झा

यौ दुल्हा चिन्ही लियौ
विभा झा

बेरी-बेरी बरजहुँ
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

समधि के हम गारि नइ दैय छी
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

घर पछुअरबामे
विभा झा

परिछी कोई ले रे
कंचन झा

