गीत के बोल
प्रथम मास आषाढ़( अखार) सुन्दरी श्याम गेलि मोही तेजि यौ,
कोन विधि हम मास खेपब के हरत दुख मोर यौ ।
प्रथम मास आषाढ़( अखार) सुन्दरी श्याम गेलि मोही तेजि यौ,
कोन विधि हम मास खेपब के हरत दुख मोर यौ ।
साबन चमकए बिजुरी छिटकए हृदय हहरए मोर यौ - 2
आजु नहि नन्दलाल अओता आब जीवन कोन काज यौ - 2
भादब निशि अन्धयारी जामिनी लोकजीवन रङ्गक शब्द यौ,
श्याम सुन्दर कुबुझि बश भेल रहत मोही अऽब तेजि यौ,
श्याम सुन्दर कुबुझि बश भेल रहल मोही अऽब तेजि यौ,
आसिन हे सखी आश लगाओल आशो नहि पुरल हमार यौ - 2
राम-कृष्ण मोरारी भजू मन पुरत मन अभिलाष यौ,
पुरत मन अभिलाष यौ ।।
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गाने का विवरण
संस्कृत के चातुर्मास्य से उत्पन्न चौमासा गीत चार महीनों—आषाढ़, सावन, भाद्रपद और आश्विन—का भावपूर्ण चित्रण करते हैं, जिनमें नायिका के विरह की पीड़ा और व्याकुलता का मार्मिक स्वर सुनाई देता है। परंपरा के अनुसार इस अवधि में विवाह, यात्रा और विदाई जैसे शुभ कार्य वर्जित होते हैं; यदि प्रिय आषाढ़ से पहले न लौट सके, तो उसे इन चार महीनों तक दूर ही रहना पड़ता है। इस गीत में भी नायिका श्याम के बिछोह में तड़प रही है—बिजुरी की चमक, मेघ की गर्जन और वर्षा की बूंदें उसके मन की उदासी को और गहरा कर देती हैं। हर बीतते मास के साथ उसकी आशा कम होती जाती है, फिर भी वह उनके लौटने की प्रार्थना और अभिलाषा को थामे प्रतीक्षा करती रहती है।
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