गीत के बोल
भोला किअ रुसल छी यौ - 2
झारखण्ड मे जा कऽ दानी - 2 किअ बसल छी यौ,
यौ भोला किअ रुसल छी यौ ।
कते अधम के तारलहुँ भोला,
हमरो तारू यौ। - 2
एक बेर सुनयौ यौ बम भोला - 2
बिनती सुनयौ यौ ।
यौ भोला किअ रुसल छी यौ ।
कुशेश्वर विदेशर गेलहुँ ,
कतउ नहि भेटलहुँ यौ। - 2
रने-बने ताकि कऽ बैसलहुँ - 2
तइयो नहि भेटलहुँ यौ ।
यौ भोला किअ रुसल छी यौ ।
दुखहि जनम भेल दुखहि गमाओल,
आबहुँ तारीयौ यौ। - 2
बिपति के मोटरी सगरी जनम हम - 2
ढोइते रहलहुँ यौ ।
यौ भोला किअ रुसल छी यौ ।
मन के मनोरथ मने मे राखल,
ककरा कहबइ यौ। - 2
द्वार छोड़ि नइ जायब भोला - 2
जँ नहि सुनबइ यौ ।
यौ भोला किअ रुसल छी यौ ।
झारखण्ड मे जा कऽ दानी - 2
किअ बसल छी यौ,
यौ भोला किअ रुसल छी यौ - 3
पूरे बोल देखें
गाने का विवरण
यह एक ‘नचारी’ गीत है। मिथिला में नचारी गीतों के माध्यम से भक्त शिव के सामने अपनी लाचारी, पीड़ा और आर्तनाद व्यक्त करते हैं। इस गीत में भक्त अपने आराध्य महादेव भोला को प्रेम और अधिकार के साथ उलाहना दे रहा है। वह कहता है — “हे दानी भोलेनाथ! आप मुझसे क्यों रूठे हुए हैं? मुझे छोड़कर झारखंड में जाकर क्यों बस गए हैं? आपने न जाने कितने अधम लोगों का उद्धार किया है, तो फिर मुझे क्यों छोड़ दिया? मेरी भी नैया पार लगाइए। बस एक बार मेरी विनती सुन लीजिए।” भक्त कहता है कि वह भोलेनाथ की खोज में कुशेश्वर और विदेशर जैसे तीर्थस्थलों तक गया, लेकिन वहाँ भी उन्हें नहीं पा सका। उसने वन-वन और निर्जन मार्गों में भी उन्हें खोजा, फिर भी दर्शन नहीं हुए। वह अपने जीवन का दुख सुनाता है — “मेरा जन्म दुख में हुआ और पूरा जीवन दुखों में ही बीत गया। मैं सारी उम्र विपत्तियों की भारी पोटली ढोता रहा हूँ। अब तो मुझे तार दीजिए।” उसके मन की इच्छाएँ मन में ही दबी रह गई हैं। वह पूछता है — “आपके अलावा मैं अपना दुख किससे कहूँ?” अंत में वह अधिकार से कहता है — “यदि आप मेरी बात नहीं सुनेंगे, तो भी मैं आपके द्वार से जाने वाला नहीं हूँ।”
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