शिव पार्वती, मधुबनी पेंटिंग शैली
शिव पार्वती, मधुबनी पेंटिंग शैली

गीत के बोल

बजलनि गिरजा सँ महादेव चलू मेला घुमैलय- 2
मेला घुमैलय चलू मेला घुमैलय- 2
बजलनि गिरजा सँ महादेव चलू मेला घुमैलय- 2

अहि जंगल मे सब दिन रहि कऽ मन हमर उबिआ गेल - 2
नित दिन भाङ्ग-धथूरो खा कऽ देह हमर दुबरा गेल - 2
मन होइयऽ खाय जिलेबी चलू मेला घुमैलय- 2
बजलनि गिरजा सँ महादेव चलू मेला घुमैलय।

ओहिठाम सँ जाएब कलकत्ता शार्ट-पेंट सिलबा लेल - 2
बाघम्बर भेल भेस पुरनका ओकरा आब हटा देब - 2
कंटा-कोकोकोला पिला देब चलू मेला घुमैलय- 2
बजलनि गिरजा सँ महादेव चलू मेला घुमैलय- 2

पूरे बोल देखें

गाने का विवरण

इस मज़ेदार और कल्पनाशील महेशवाणी गीत में भगवान शिव, गिरिजा (पार्वती) से कहते हैं कि उन्हें अब जंगल का साधु-संन्यासी जीवन उबाऊ लगने लगा है। रोज़ भांग-धतूरा खाकर उनका शरीर कमजोर हो गया है, और अब उनका मन मेले घूमने को कर रहा है। वो कहते हैं कि चलो मेला घूमते हैं, वहाँ जलेबी खाएँगे, कोका-कोला पीएँगे, और कोलकाता से शर्ट-पैंट सिलवाएँगे। अपने पुराने बाघम्बर को छोड़ कुछ नया पहनेंगे। "इस हल्के-फुल्के संवाद के माध्यम से यह गीत भगवान शिव को एक हास्यपूर्ण अंदाज़ में मानवीय रूप देता है, जहाँ दिव्य छवि आम लोगों की ज़रूरतों और इच्छाओं से जुड़ जाती है।

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