गाने का विवरण
इस मज़ेदार और कल्पनाशील महेशवाणी गीत में भगवान शिव, गिरिजा (पार्वती) से कहते हैं कि उन्हें अब जंगल का साधु-संन्यासी जीवन उबाऊ लगने लगा है। रोज़ भांग-धतूरा खाकर उनका शरीर कमजोर हो गया है, और अब उनका मन मेले घूमने को कर रहा है। वो कहते हैं कि चलो मेला घूमते हैं, वहाँ जलेबी खाएँगे, कोका-कोला पीएँगे, और कोलकाता से शर्ट-पैंट सिलवाएँगे। अपने पुराने बाघम्बर को छोड़ कुछ नया पहनेंगे। "इस हल्के-फुल्के संवाद के माध्यम से यह गीत भगवान शिव को एक हास्यपूर्ण अंदाज़ में मानवीय रूप देता है, जहाँ दिव्य छवि आम लोगों की ज़रूरतों और इच्छाओं से जुड़ जाती है।











