
गीत के बोल
यौ गजानन गणपति,
विनती करै छी आबु यौ
स्मरण पूजन ध्यान में,
स्थान पहिने पाबु यौ
यौ गजानन गणपति
हे गौरी के लाल उदर विशाल
भव्य तेज भाल मुँख मंगला
मंगला मुख मंगला -2
हे विघ्नहर्ता सिद्धि दाता
एक दन्त शिव लाडला
लाडला शिव लाडला -2
संग साजे रिद्धि सिद्धि
महिमा अहीं के गाबी यौ
यौ गजानन गणपति, विनती करै छी आबु यौ
यौ गजानन गणपति
अछि पित वसन स्वर्ण कमल आसन
मुस बाहन करू भला
करू भला करू भला -4
इन्द्र वरुण कुबेर दिगपाल,
हाथ जोडि सब द्वार एला
द्वार एला सब द्वार एला -2
करुणा निधान झट करू निदान
जग मंगल घट बरसाबु यौ
यौ गजानन गणपति, विनती करै छी आबु यौ
यौ गजानन गणपति
हे जग के स्वामी दया के सागर
अहीं छी सब दुख हरै वला
हरै वला हरै वला -2
अहीं ल प्यासल हिया के गागर
अहीं छी शुभ लाभ भरै वला
भरै वला भरै वला -2
छी मूरख नै ज्ञान की करू बखान
नित चरण शीश झुकाबी यौ
यौ गजानन गणपति,
विनती करै छी आबु यौ
स्मरण पूजन ध्यान में,
स्थान पहिने पाबु यौ
यौ गजानन गणपति
हवन पूजन अनुष्ठान में
विनती करै छी आबु यौ
सम्मान पहिने पानु यौ
यौ गजानन गणपति,
विनती करै छी आबु यौ
यौ गजानन गणपति
पूरे बोल देखें
गाने का विवरण
मिथिला में किसी भी शुभ कार्य या अनुष्ठान का आरंभ गणपति वंदना से होता है — और यह भजन उसी परंपरा की सजीव अभिव्यक्ति है। इस गीत में गणेश के प्रति अनुराग और श्रद्धा की झलक है। उनसे प्रार्थना की गई है कि “हे गजानन गणपति! चाहे ध्यान हो या पूजा, आपका स्थान सबसे पहले है; इसलिए कृपा कर पधारें और अपना आसन ग्रहण करें।” भजन में गणेश के दिव्य स्वरूप का वर्णन है। वे माता पार्वती के पुत्र हैं — विशाल उदर वाले, तेजस्वी मस्तक और मंगलकारी मुख वाले। वे विघ्नों को हरने वाले, सफलता देने वाले, एकदंत और शिव के प्रिय पुत्र हैं, जिनके साथ रिद्धि और सिद्धि शोभा पाती हैं। पीले वस्त्र धारण किए वे स्वर्ण कमल पर विराजमान हैं, और मूषक उनका वाहन है। इन्द्र, वरुण और कुबेर जैसे देवता भी उनके द्वार पर नतमस्तक खड़े रहते हैं। भक्त कहते हैं, “हे करुणानिधान! हमारी समस्याओं का समाधान करें और संसार पर कल्याण की वर्षा करें।” अंत में विनम्र भाव से कहा गया है कि हम अज्ञानी हैं और आपकी महिमा का वर्णन करने की क्षमता नहीं रखते। हम तो बस प्रतिदिन आपके चरणों में शीश झुकाते हैं।
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