
गीत के बोल
हे सखी! .......
हे सखी! सुख हम की कहू,
अछि आयल दिवस महान ।
आइ अयताह निज गृह-पिया,
जे बसथि साँस मन प्राण - 2
आऽ .... आऽ .... आऽ ....
मोनक आँगन मे गुजए मधुर रागिनी,
आइ मधुबन मे अओता सजन ।-2
तन कमलिनी खिलल सुप्त आशा जगल - 2
शीघ्र कान्हा सँ होयत मिलन ।
आइ घुलि गेल सुलभ स्नेह सम्बन्ध मे,
मग्न तन-मन हमर प्रेम आनन्द मे ।
हे कन्हैया! कतय छी नुकायल अहाँ - 2
तीव्र कोमल हृदय के तपन ।
मोनक आँगन मे गुजए मधुर रागिनी,
आइ मधुबन मे अओता सजन ।
नील अम्बर सँ ...... - 2
नील अम्बर सँ टपकय सरस धार जे - 2
छेड़ देलक हमर ओ हृदय तार के ।
नील अम्बर सँ टपकय सरस धार जे,
छेड़ देलक हमर ओ हृदय तार के - 2
नील अम्बर सँ ......
नील अम्बर सँ टपकय सरस धार जे,
छेड़ देलक हमर ओ हृदय तार के ।
गान यमुना के कल-कल धवल चाँदनी,
दिव्य मुरली के धुन आइ लगय दामिनी ।
हे मुरारी! मुरारी .......
हे मुरारी! निकालू विरह जाल सँ,
तप्त कयलक शीतल पवन ।
मोनक आँगन मे गुजए मधुर रागिनी,
आइ मधुबन मे अओता सजन ।
(आलाप)
छल प्रतिक्षा ओ आयल प्रणय के घड़ी - 2
प्राण तन-मन मे कोना आब रहत सखी ।
छल प्रतिक्षा ओ आयल प्रणय के घड़ी,
प्राण तन-मन मे कोना आब रहत सखी - 2
छल प्रतिक्षा ओ आयल प्रणय के घड़ी,
प्राण तन-मन मे कोना आब रहत सखी ।
आब बचब हम कोना नयन के वाण सँ,
श्याम सुन्दर के रूपक नवल चान सँ ।
हे यौ गोविन्द! गोविन्द ......
हे यौ गोविन्द! दर्शन के पियासल नयन,
आब सुधि-बुद्धि रहल नइ अपन ।
मोनक आँगन मे गुजए मधुर रागिनी,
आइ मधुबन मे अओता सजन ।
( आलाप)
कान्ति अद्भूत भृकुटी भव्य पिअर बसन - 2
आइ त्रिलोकी मे दोसर कियो नइ ओहन ।
कान्ति अद्भूत भृकुटी भव्य पिअर बसन,
आइ त्रिलोकी मे दोसर कियो नइ ओहन - 2
कान्ति अद्भूत भृकुटी भव्य पिअर बसन,
आइ त्रिलोकी मे दोसर कियो नइ ओहन ।
कान कुण्डल ओ मुसकैत अधर प्रेम मे,
देखि सौन्दर्य अनुपम पलक नइ हटय।
हे यौ मोहन! मोहन .......
हे यौ मोहन! एतेक आब बेकल नइ करू,
स्नेह संगम के बादल सघन ।
मोनक आँगन मे गुजए मधुर रागिनी,
आइ मधुबन मे अओता सजन ।
गोविन्द ..... गोविन्द .....
हे यौ कन्हैया! कतय छी नुकायल अहाँ।
गोविन्द ..... गोविन्द .....
हे यौ कन्हैया! कतय छी नुकायल अहाँ।
गोविन्द ..... गोविन्द .....
हे यौ कन्हैया! कतय छी नुकायल अहाँ।
कतय छी नुकायल अहाँ - 3
कान्हा ....... ।
पूरे बोल देखें
गाने का विवरण
यह गीत मैथिली साहित्य की कृष्ण-भक्ति और शृंगार परंपरा का एक उदाहरण है। इसमें एक सखी की उस मनःस्थिति का चित्रण है, जब लंबे विरह के बाद कान्हा से मिलन की आशा जाग उठती है। सखी कहती है, “आज मेरी खुशी शब्दों में नहीं समा रही। वह दिन आ गया है जब मेरे प्रियतम, जो मेरे प्राणों में बसते हैं, घर आने वाले हैं।” उसके मन के आँगन में मधुर रागिनी गूँज उठती है और सोई हुई आशाएँ जाग जाती हैं। प्रकृति भी मानो इस प्रेम-भाव में सहभागी है। नीले आकाश से मानो रस की धारा झर रही है और मन के तारों को छेड़ रही है। यमुना की कल-कल, उज्ज्वल चाँदनी और मुरली की धुन पूरे वातावरण को जीवंत कर देती है। विरह की व्याकुलता में वह मुरारी से प्रार्थना करती है कि उसे इस विरह-जाल से बाहर निकालें। शीतल पवन भी उसे तपती हुई लगती है। प्रतीक्षा समाप्त होने को है और प्रणय की घड़ी निकट है। सखी कहती है कि इस अपार आनंद में प्राण तन-मन में कैसे ठहरें। श्यामसुंदर का रूप नवचंद्र-सा है और उनकी दृष्टि के बाणों से बच पाना असंभव है। पीताम्बर धारण किए, कुंडलों से सजे और मुस्कान से दीप्त उनके रूप को निहारते हुए उसकी पलकें हटती नहीं। फिर भी, इसी बेकली में वह पुकार उठती है, “हे कन्हैया, आप कहाँ छिपे हैं?”
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