
गीत के बोल
जय शिवप्रिये शंकरप्रिये जय मंगले मंगल करू - 2
माँ अम्बिके जगदम्बिके जय चण्डिके मंगल करू ।
कराल मुख कपालनी अमोघ शक्तिशालिनी - 2
निशुम्भ-शुम्भ भेदनी त्रिशूल-चक्र धारणी,
हे कल्याणी नारायणी माँ भगवती मंगल करू ।
हे ईश्वरी परमेश्वरी सर्वेश्वरी मंगल करू ।
अनन्त शक्तिशालिनी विशाल मुण्डमालिनी - 2
असीम कष्टहारणी त्रिमुर्ति शिष्टकारणी,
हे भद्रकाली भैरवी माँ भगवती मंगल करू ।
हे वैष्णवी विश्वांभरी माँ शाम्भवी मंगल करू ।
प्रकृति अहीं स्वीकृति अहीं दया अहीं क्षमा अहीं - 2
कला अहीं श्रद्धा अहीं दया अहीं क्षमा अहीं,
दुखहारणी सुखदायणी माँ भगवती मंगल करू ।
हे ललित शक्ति-प्रदायणी माँ भगवती मंगल करू ।
जय शिवप्रिये शंकरप्रिये जय मंगले मंगल करू - 2
माँ अम्बिके जगदम्बिके जय चण्डिके मंगल करू ।
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गाने का विवरण
यह गीत मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत ‘गोसाउनिक गीत’ का एक सुंदर उदाहरण है। मिथिलांचल में शक्ति-उपासना की परंपरा है और हर घर में गोसाउनिक घर होता है जिसमें कुलदेवी की स्थापना की जाती है। यह स्तुति किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में देवी का आशीर्वाद लेने के लिए गाई जाती है। इसमें भक्त और माँ के बीच एक सुंदर पारिवारिक रिश्ता दिखाई देता है, जहाँ देवी को परिवार के रक्षक के रूप में देखा जाता है। गीत में माँ के सौम्य और रौद्र – दोनों रूपों का वर्णन है। जहाँ एक ओर उन्हें ‘शिवप्रिये’ और ‘अम्बिके’ जैसे ममतामयी नामों से पुकारा गया है, वहीं दूसरी ओर ‘चण्डिके’ और ‘निशुम्भ-शुम्भ भेदनी’ कहकर उनके असुर-विनाशिनी रूप की महिमा गाई गई है। गीत की प्रत्येक पंक्ति 'मंगल करू' के आह्वान के साथ भक्त की शरणागति को दर्शाती है। इसमें देवी को केवल एक शक्ति के साथ- साथ, प्रकृति, दया, क्षमा और कला का मूल आधार माना गया है। प्रत्येक घर के गहबर में स्थापित गोसाउन की यह वंदना सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है।
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