गाने का विवरण
मिथिला में होली का पर्व केवल रंग–गुलाल का उत्सव नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन और सामाजिक मेल–मिलाप का भी प्रतीक है। वसंत के आगमन से चारो ओर उल्लास फैल जाता है और ये फागुन गीत उस सामूहिक उमंग को स्वर देते हैं। अबीर-गुलाल से जैसे वायुमंडल रंगीन हो जाता है, वैसे ही मन और संबंध भी रसमय हो उठते हैं। जाति–पाँति, ऊँच–नीच का भेद मिटाकर ये गीत सबको एक डोर में बाँधते हैं और खेत-खलिहान से लेकर महलों तक गूंजते हैं। यह पारंपरिक फ़ाल्गुन गीत होली की मस्ती और प्रेमिल वातावरण का सजीव चित्रण करता है। बार-बार दोहराई गई पंक्ति “हो मचैयऽ होली मिथिला मे” मिथिलावासियों के उमंग और हर्षोल्लास को व्यक्त करती है। गीत सवाल जवाब के रूप में है- गीत में खेल–खेल में पूछा जाता है कि किसके हाथ में सुनहरी पिचकारी है, किसके हाथ में अबीर की झोरी, किसका पीला पीताम्बर वस्त्र और किसकी फूल जैसी साड़ी भीग गई है और जवाब में राम और सीता का नाम लिया गया है —जैसे की होली के रंग-अबीर की मधुमय बेला में स्वयं दिव्य युगल भी होली खेलने मिथिला आ पहुंचे हों ।
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