


मिथिला में होली का पर्व केवल अबीर–गुलाल का उत्सव नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन और सामाजिक मेल–मिलाप का भी प्रतीक है। बसंत के आगमन से चारो ओर उल्लास फैल जाता है और ये फाल्गुन गीत उस सामूहिक उमंग को स्वर देते हैं। अबीर-गुलाल से जैसे वायुमंडल रंगीन हो जाता है, वैसे ही मन और संबंध भी रसमय हो उठते हैं। जाति–पाँति, ऊँच–नीच का भेद मिटाकर ये गीत सबको एक डोर में बाँधते हैं और खेत-खलिहान से लेकर महलों तक गूंजते हैं।
मिथिला में होली का पर्व केवल अबीर–गुलाल का उत्सव नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन और सामाजिक मेल–मिलाप का भी प्रतीक है। बसंत के आगमन से चारो ओर उल्लास फैल जाता है और ये फाल्गुन गीत उस सामूहिक उमंग को स्वर देते हैं। अबीर-गुलाल से जैसे वायुमंडल रंगीन हो जाता है, वैसे ही मन और संबंध भी रसमय हो उठते हैं। जाति–पाँति, ऊँच–नीच का भेद मिटाकर ये गीत सबको एक डोर में बाँधते हैं और खेत-खलिहान से लेकर महलों तक गूंजते हैं।
गीतों में
फाल्गुन

जोगिनि संग लियो
डॉ. रानी झा

जोगिनि संग लियो
डॉ. रानी झा

जोगिनि संग लियो
डॉ. रानी झा

हो मचैयऽ होली
विभा झा

हो मचैयऽ होली
विभा झा

हो मचैयऽ होली
विभा झा
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