
गीत के बोल
आनन गोटी चानन गोटी,
बउआ खेतइ दुधे रोटी ।
आनन गोटी चानन गोटी,
बउआ खेतइ दुधे रोटी ।
सुग्गा मैना मित लगौतइ,
गुटूर-गुटूर परबा बतियौतइ,
हाँ ...गुटूर-गुटूर परबा बतियौतइ ।
सतरंगी संसार सँ, भानुमति के पिटार सँ - 2
नहुँए-नहुँए निनिआँ निकलल - 2
डोलिया कहार सँ - 2
पवन बसंती दइ छइ थपकी,
मौसी बनि उदगार सँ ।
पवन बसंती दइ छइ थपकी,
मौसी बनि उदगार सँ ।
सुत गे चुन्नी, सुत गे मुनिया - 2
निनिआँ कहए दुलार सँ ।
सतरंगी संसार सँ भानुमति के पिटार सँ,
नहुँए-नहुँए निनिआँ निकलल - 2
डोलिया कहार सँ ।
सुनि-सुनि निनिआँ के कनफुसकी,
बन्द पलक आ ठोरक मुसकी ।
हाँ ... सुनि-सुनि निनिआँ के कनफुसकी,
बन्द पलक आ ठोरक मुसकी ।
जुग-जुग जीबू त्रिशित मनाबए - 2
भोलेनाथ उदार सँ ।
सतरंगी संसार सँ भानुमति के पिटार सँ,
नहुँए-नहुँए निनिआँ निकलल - 2
डोलिया कहार सँ - 2
पूरे बोल देखें
गाने का विवरण
यह कालीकान्त झा ‘तृषित’ द्वारा रचित, मैथिली लोक-परंपरा में रची एक समकालीन लोरी है। इस लोरी में माँ अपने बच्चे को सुलाने के लिए स्नेह, प्रकृति और कल्पना का सुंदर संसार रचती है। वह बच्चे को चाँद दिखाते हुए दूध-रोटी खाने को कहती है। तोता और मैना उसके मित्र होंगे, और कबूतर उससे गुटर-गूँ करते हुए बातें करेगा। लोरी में नींद धीरे-धीरे एक जादुई संसार से चलकर आती है। वह सात रंगों की दुनिया और ‘भानुमति के पिटारे’ से निकलती है, मानो कहारों की डोली में बैठकर आ रही हो। वसंत की हवा मौसी की तरह बच्चे को प्यार से थपकी देती है, और नींद बड़े लाड़ से पुकारती है — “सो जा चुन्नी, सो जा मुनिया।” नींद की फुसफुसाहट सुनते-सुनते बच्चे की पलकें बंद हो जाती हैं और होंठों पर हल्की मुस्कान आ जाती है। अंत में कवि उसे आशीर्वाद देते हैं कि भोलेनाथ की कृपा से वह जुग-जुग जिए।
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