गाने का विवरण
बटगबनी मिथिला की महिलाओं द्वारा गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर चलते-चलते गाया जाने वाला मधुर लोकगीत है। ‘सजनी गे’ की टेक से पहचाने जाने वाले इस गीत में स्वरों के आरोह-अवरोह और संयोग-वियोग के भाव इसे अत्यंत मनमोहक बनाते हैं।इस गीत में नायिका अपने प्रिय के परदेस चले जाने से व्याकुल है और सखी से कह रही है कि प्रिय के बिना आँगन सूना और बियाबान लगता है, सेज भी नहीं सुहाती, और आँखों का काजल आँसुओं के साथ बह गया है। वह कहती है कि पता नहीं प्रिय कब आएँगे—आखिर पुरुषों पर भरोसा करना कठिन है। विरह की व्यथा और मिलन की अनिश्चितता—दोनों ही इस गीत के कोमल सुरों में गुंथे हैं।













