


सांझ गीत मिथिला के गाँवों में गोधूलि बेला के साथ गूंजते हैं। जैसे-जैसे शाम का धुंधलका छाता है, खेतों से लौटते किसान और मजदूर ढोल-मजीरे के साथ इन्हें गाते हुए घर की ओर बढ़ते हैं। संध्या समय महिलाएं इन्हें देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए समवेत स्वर में गाती हैं, साथ ही तुलसी के नीचे दीपक जलाते समय भी।
ये गीत जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों में एक पवित्र सूत्र की तरह पिरोए हुए हैं और मुंडन, उपनयन, विवाह जैसे शुभ संस्कारों के अवसर पर भी गाए जाते हैं।
सांझ गीत मिथिला के गाँवों में गोधूलि बेला के साथ गूंजते हैं। जैसे-जैसे शाम का धुंधलका छाता है, खेतों से लौटते किसान और मजदूर ढोल-मजीरे के साथ इन्हें गाते हुए घर की ओर बढ़ते हैं। संध्या समय महिलाएं इन्हें देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए समवेत स्वर में गाती हैं, साथ ही तुलसी के नीचे दीपक जलाते समय भी।
ये गीत जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों में एक पवित्र सूत्र की तरह पिरोए हुए हैं और मुंडन, उपनयन, विवाह जैसे शुभ संस्कारों के अवसर पर भी गाए जाते हैं।
गीतों में
सांझ

साँझ भइ घर दिअरा जरी रे
डॉ. रानी झा

साँझ भइ घर दिअरा जरी रे
डॉ. रानी झा

साँझ भइ घर दिअरा जरी रे
डॉ. रानी झा

कोने बाबा घर साँझ
डॉ. रानी झा

कोने बाबा घर साँझ
डॉ. रानी झा

कोने बाबा घर साँझ
डॉ. रानी झा

सखी हे साँझ भयओ
डॉ. रानी झा

सखी हे साँझ भयओ
डॉ. रानी झा

सखी हे साँझ भयओ
डॉ. रानी झा

साँझ दिअ साँझ दिअ
विभा झा

साँझ दिअ साँझ दिअ
विभा झा

साँझ दिअ साँझ दिअ
विभा झा
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