
वर्षा ऋतु की रिमझिम फुहार जब सूखी धरती पर पड़ती है तो मानो प्रेमी हृदय और भी व्याकुल हो उठता है। मिथिला के मलार (मल्हार) गीतों में—जिन्हें कजरी भी कहते हैं—यह वियोग-भाव बड़ी प्रबलता से प्रकट होता है। "सखी रे" इन गीतों की खास पहचान है, क्योंकि विरहिणी अपने मन की सबसे गहरी बात सखी से ही कह पाती है।
गीतों में
मलार

हे उद्धो श्याम हमर
डॉ. रानी झा

हे उद्धो बड़ा रे चतुर
डॉ. प्रेमलता मिश्रा

सावन के बुन्नी झीसी
विभा झा

हमर दुखक नहि ओर
रजनी-पल्लवी

सखिया सावन में डर लागे
डॉ. प्रेमलता मिश्रा


