मिथिला क्षेत्र का नक्शा

मिथिला : एक परिचय

डॉ. दीपक कुमार, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल० ना० मि० वि०, दरभंगा

'मिथिला' शब्द-व्युत्पत्ति

'मिथिला' संस्कृत के 'मिथ' शब्द से बना है, जिसका अर्थ है - संयुक्त। प्राचीन काल में जो विदेह, वैशाली एवं अंग प्रदेश था, बाद में वही संयुक्त होकर मिथिला नाम से विख्यात हुआ। इस क्षेत्र पर राज करने वाले विदेह राजवंश के प्रसिद्ध राजा मिथि के नाम पर ही इसका नाम 'मिथिला' पड़ा। 'बृहद्-विष्णुपुराण' में इस भूखण्ड के बारह नाम दिए गए हैं, जिनमें विदेह, तीरभुक्ति/तिरहुत एवं मिथिला विशेष लोकप्रिय हुए।

भौगोलिक सीमा-क्षेत्र

मिथिला की परम्परागत सीमा बृहद्-विष्णुपुराण के अनुसार - उत्तर में हिमालय, दक्षिण में गंगा, पूर्व में कोशी और पश्चिम में गंडक नदियाँ बहती हैं। इसके अन्तर्गत बिहार के पुराना मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, चम्पारण, उत्तरी मुंगेर, भागलपुर, पूर्णिया के साथ झारखण्ड के सीमावर्ती जिले एवं नेपाल के तराई क्षेत्र शामिल हैं।

मिथिला का सांस्कृतिक पक्ष

भारत की सांस्कृतिक विविधता में मिथिला एक विशिष्ट और प्राचीन सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित रही है। मिथिला संस्कृति की विशेषता इसकी निरन्तरता है। समय के साथ अनेक राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्त्तन हुए, किन्तु मिथिला ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखा। मिथिला की सांस्कृतिक समृद्धता के कुछ महत्त्वपूर्ण पक्ष इस प्रकार हैं-

पौराणिक पृष्ठभूमि

मिथिला का उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, उपनिषद् तथा रामायण में मिलता है। यह प्राचीन विदेह राज्य की राजधानी थी। राजा जनक के दरबार में याज्ञवल्क्य जैसे दार्शनिकों द्वारा आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष पर गहन विमर्श हुआ। माता सीता का जन्म मिथिला में होने के कारण यह भूमि रामायणकालीन संस्कृति की केन्द्रीय धुरी बन जाती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

विदेह वंश का शासन लगभग 3000 ई०पू० से 600 ई०पू० तक रहा, जो वैदिक संस्कृति का स्वर्ण युग था। इस दौर में जनक, याज्ञवल्क्य, गार्गी और मैत्रेयी जैसे महान विचारक हुए।

600 ई०पू० से 320 ई०पू० तक वज्जि गणराज्य का शासन रहा, जो बौद्ध धर्म का उत्कर्ष काल था। यद्यपि बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा, परन्तु मिथिला में ब्राह्मणवाद और उसकी संस्कृति बनी रही।

1097 ई० में कर्नाटक के राजा नान्यदेव ने स्वतंत्र मिथिला राज्य की आधारशिला रखी। कर्नाटक राजाओं के शासनकाल (1097-1326 ई०) में पारम्परिक शास्त्रीय विचार, कला, संस्कृति और साहित्य का विकास हुआ। साथ ही मिथिला की संगीत साधना की शुरुआत हुई। पहले राजा नान्यदेव और आखिरी राजा हरिसिंहदेव संगीत विधा के कुशल जानकार और पोषक थे। राजा हरिसिंहदेव के आश्रय में ज्योतिरीश्वर ठाकुर ने 'वर्णरत्नाकर' की रचना की, जो उत्तर भारतीय भाषाओं का आधार-ग्रन्थ बना।

चौदहवीं शताब्दी से ओइनवार वंश का शासन आरम्भ हुआ। राजा शिवसिंह के काल में विद्यापति जैसे महान कवि ने मैथिली को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। 1557 ई० में खण्डवला वंश की स्थापना हुई। ब्रिटिश शासन में पाश्चात्य संस्कृति के सम्पर्क से मैथिली साहित्य में विशेष परिवर्त्तन हुआ।

1947 ई०मेंआजादीकेबादनवीनराज्योंकागठनहुआ।उसीसमयसेमिथिलाकेविभिन्नसंगठनएवंआन्दोलनकारियोंकीबिहारसेपृथकअलगमिथिलाराज्यकीमाँगरहीहै।लेकिनआजभीप्राचीनमिथिलाकाअधिकांशहिस्साबिहारराज्यमेंतथाकुछहिस्साझारखण्डऔरनेपालकेतराईक्षेत्रोंमेंबँटाहुआहै।

कला एवं शिल्प

मिथिला हस्तकला और लोककला के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। आज यहाँ की कला केवल सौन्दर्य का प्रतीक ही नहीं है, बल्कि आर्थिक आवश्यकताओं को भी पूरा कर रही है। मिथिला की कुछ उल्लेखनीय कलाएँ एवं शिल्प निम्न हैं –

मिथिला (मधुबनी) पेंटिंग: यह इस क्षेत्र की सबसे प्रभावशाली एवं लोकप्रिय कला है। ऐतिहासिक रूप से यह महिलाओं द्वारा मिट्टी की दीवारों पर शुभ अवसरों पर बनाई जाती थी। इसमें प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है, जिसमें धार्मिक-पौराणिक घटनाओं और अनुष्ठानों एवं प्रकृति-चित्रण को दर्शाया जाता है। मिथिला पेंटिंग/मधुबनी पेंटिंग/मधुबनी कला को GI (Geographical Indication) टैग प्राप्त है।

सिक्की घास शिल्प: इसे 'गोल्डन ग्रास' के नाम से भी जाना जाता है। दलदली क्षेत्रों में उगने वाली इस घास से मिथिला की महिलाएं सुन्दर टोकरियाँ (मउनी), बक्से (पउती), खिलौने आदि बनाती हैं। यह शिल्प अपनी मजबूती और चमकदार रंग के लिए प्रसिद्ध है। इस कला को भी GI (Geographical Indication) टैग प्राप्त है।

पेपर मेशी (कागज की लुगदी): पुराने कागजों को गलाकर, उसमें मुल्तानी मिट्टी और गोंद मिलाकर बनाई गई यह कला बेहद प्राचीन है। इससे बने मास्क, पात्र और मूर्तियाँ मिथिला पेंटिंग के रंगों से सजाई जाती हैं।

सुजनी कढ़ाई: पुराने सूती कपड़ों को परतों में सिलकर उन पर रंगीन धागों से बारीक कढ़ाई करना सुजनी कहलाता है। यह कला मुख्य रूप से सामाजिक सन्देशों और ग्रामीण जीवन के दृश्यों को उकेरने का माध्यम है।

अरिपन: यह जमीन पर बनाई जाने वाली एक प्रकार की रंगोली है, जिसे चावल के आटे के घोल (पिठार) से उंगलियों की मदद से बनाया जाता है। यह सामान्यतः धार्मिक अनुष्ठानों पर बनाया जाता है और प्रत्येक अरिपन का एक विशेष धार्मिक महत्त्व होता है।

भागलपुरी सिल्क: यह भारत का एक प्रसिद्ध पारम्परिक वस्त्र है, जिसका निर्माण बिहार राज्य के मिथिला क्षेत्र के भागलपुर जिले में होता है। इसी कारण भागलपुर को 'सिल्क सिटी ऑफ इंडिया' भी कहा जाता है। भागलपुरी सिल्क मिथिला की समृद्ध हस्तशिल्प परम्परा का प्रतीक है और देश–विदेश में इसकी काफी माँग है। इससे बनी साड़ियाँ, सूट, दुपट्टे और चादर अपनी कोमलता, अनोखी बनावट, चमक और टिकाऊपन के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। यह शिल्प मिथिला की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है और इसे GI (Geographical Indication) टैग भी प्राप्त है।

ये सभी हस्तशिल्प एवं कलाएँ मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक पटल पर गौरवान्वित करती हैं।

खान-पान

मिथिला का खान-पान प्रकृति से गहराई से जुड़ा है। प्रसिद्ध लोकोक्ति है - "पग-पग पोखर, माछ, मखान। सरस बोल, मुस्की मुखान।" अर्थात् यहाँ हर कदम पर तालाब, मछली और मखाने की बहुलता है और यहाँ के लोग अपनी मधुर वाणी व मुस्कान के लिए जाने जाते हैं।

माछ-भात: मिथिला में मछली को शुभ माना जाता है। सरसों वाली मछली और चावल का मेल प्रसिद्ध है। धार्मिक अनुष्ठानों और विवाह जैसे शुभ कार्यों में भी मछली परोसा जाना यहाँ की विशिष्ट सांस्कृतिक परम्परा को दिखाता है।

मखाना: विश्व के 90% मखाना उत्पादन का स्रोत मिथिला है। मखाने की खीर और विभिन्न व्यंजन प्रसिद्ध हैं। मिथिला मखाना को GI टैग प्राप्त है।

दही-चूड़ा: यह सबसे लोकप्रिय नाश्ता है और मेहमानों के स्वागत में परोसा जाता है।

तरुआ: विभिन्न सब्जियों को बेसन में लपेटकर तला जाने वाला यह व्यंजन भोजन का अनिवार्य हिस्सा है।

बगिया: चावल के आटे से बने पीठा जिसमें चने की दाल या गुड़ भरकर भाप में पकाया जाता है, जो स्वास्थ्य और स्वाद दोनों की दृष्टि से उत्तम है।

आदि घी और अन्त दही: मिथिला में भोजन की शुरुआत घी से और समापन दही से होता है।

पर्व-त्योहार एवं परम्परा

मिथिला के पर्व-त्योहार सामूहिक चेतना और प्रकृति-पूजन के प्रतीक हैं। 'छठ महापर्व' सूर्य, जल और जीवन-तत्त्वों के प्रति कृतज्ञता का अद्वितीय उदाहरण है। सामा-चकेबा, जुड़-शीतल, तीज, दुर्गापूजा एवं विवाह संस्कार के विभिन्न रीति-रिवाज मिथिला की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक अनुशासन को दर्शाते हैं।

सामाजिक संरचना

मिथिला में पारिवारिक मूल्य, अतिथि-सत्कार और नैतिकता को विशेष महत्त्व दिया जाता है। लोककथाएँ, कहावतें, लोकनृत्य (झिझिया) और पारम्परिक पहनावा (पाग) सामाजिक अस्मिता के प्रतीक हैं। स्त्रियों की भूमिका विशेष रूप से सृजनात्मक रही है।

दार्शनिक चेतना

मिथिला दार्शनिक चिन्तन की भूमि रही है। यहाँ जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सन्तुलन के रूप में देखा गया। जनक-दर्शन में सांसारिक दायित्वों के साथ आध्यात्मिक चेतना का समन्वय मिलता है। मिथिला में अनेक दार्शनिक हुए, जिन्होंने ज्ञान और विचारों से जीवन-मूल्यों को समझाया एवं संसार का मार्गदर्शन किया। इनमें उल्लेखनीय हैं- गार्गी, मैत्रेयी, मण्डन, वाचस्पति, आयाची, भारती, उदयनाचार्य आदि।

भाषा

'मैथिली' एक प्राचीन, समृद्ध और मधुर इंडो-आर्यन भाषा है, जिसकी उत्पत्ति मागधी प्राकृत से हुई है। मैथिली भाषा का इतिहास एक हजार वर्षों से भी अधिक पुराना माना जाता है। इसकी साहित्यिक परम्परा अत्यन्त समृद्ध है। महाकवि विद्यापति ने भक्ति, प्रेम और सौंदर्य पर आधारित रचनाओं से मैथिली साहित्य को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इसके अतिरिक्त ज्योतिरीश्वर ठाकुर, चन्दा झा, हरिमोहन झा, यात्रीजी (नागार्जुन), राजकमल चौधरी और आधुनिक साहित्यकारों ने भी इस भाषा को समृद्ध किया। यह भाषा पहले मिथिलाक्षर (तिरहुता) लिपि में लिखी जाती थी, जबकि वर्त्तमान में प्रायः देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है। मैथिली केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि मिथिला की संस्कृति, लोक-जीवन, लोक-व्यवहार, लोक-परम्परा और भावनाओं की जीवन्त अभिव्यक्ति का माध्यम है।

इसकी साहित्यिक समृद्धि के आधार पर इसे भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्ष 2003 में शामिल किया गया, जिससे इसे एक स्वतंत्र भाषा के रूप में संवैधानिक मान्यता मिली। मार्च 2018 में मैथिली को भारतीय राज्य झारखण्ड में दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त हुआ। नेपाल सरकार के 'नेपाली भाषा आयोग' ने मैथिली को कोशी प्रान्त और मधेश प्रान्त में प्रशासन के लिए प्रयुक्त आधिकारिक नेपाली भाषा बना दिया है। मैथिली भाषा की समृद्धता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी दो बोलियाँ (Dialects) 'दक्षिणी मैथिली' अर्थात् 'अंगिका' और 'पश्चिमी मैथिली' अर्थात् 'बज्जिका' वर्त्तमान में स्वतंत्र भाषा की माँग कर रही हैं।

निष्कर्ष

मिथिलाज्ञान, कलाऔरस्वादकाअद्भुतसंगमहै।मधुबनीपेंटिंगऔरसिक्कीकलानेअंतर्राष्ट्रीयस्तरपरभारतकामानबढ़ायाहै।मिथिलाकीयहगौरवशालीविरासतआजभीउतनीहीप्रासंगिकहैजितनीसदियोंपहलेथीऔरयहीइसेविश्वकीमहानतमसंस्कृतियोंमेंसेएकबनातीहै।आवश्यकताइसबातकीहैकिआधुनिकतामेंहमइनजड़ोंकोसंरक्षितरखेंऔरनईपीढ़ीकोइसअनमोलसांस्कृतिकविरासतसेजोड़ें।

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