
मुहर्रम से कुछ दिन पूर्व आरम्भ होने वाला यह सामुदायिक नृत्य–गीत प्रायः मुस्लिम पुरुषों द्वारा मंडलाकार खड़े होकर गाया–नाचा जाता है। हाथों में बाँस की बनी झररी लिए वे लयबद्ध आघात, सहज झुकाव और घूमते कदमों के साथ प्रश्न–उत्तर शैली में गीत प्रस्तुत करते हैं। स्वर, गति और ताल का ऐसा संगम बनता है कि अनेक हिंदू युवक भी भावपूर्वक इसमें शामिल हो जाते हैं। इन गीतों में हसन–हुसैन की करुण वीरगाथा गूँजती है। ताज़िया के इन गीतों को झरनी और मर्सिया भी कहा जाता है।
गीतों में


