किसान धान की रोपाई कर रहे हैं
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चांचर मिथिला की कृषि संस्कृति का महत्वपूर्ण लोकगीत है, जो धान रोपनी के समय खेत मजदूरों द्वारा प्रश्नोत्तर शैली में गाया जाता है। यह विशेषकर उस जलमग्न भूमि को खेती योग्य बनाते समय गाया जाता है जो वर्षभर पानी से भरी रहती है। कठिन परिश्रम के बीच जीवन में उत्साह बनाए रखने का यह अनूठा माध्यम है। इन गीतों में घरेलू जीवन, पारिवारिक रिश्ते, नायिका की प्रेमकथा, सास-बहू और ननद-भाभी के हास्य-विनोद का सुंदर चित्रण होता है। कठिन परिस्थितियों में भी यह गीत श्रमिकों के जीवन में ताजगी और संतोष का संचार करता है।

चांचर मिथिला की कृषि संस्कृति का महत्वपूर्ण लोकगीत है, जो धान रोपनी के समय खेत मजदूरों द्वारा प्रश्नोत्तर शैली में गाया जाता है। यह विशेषकर उस जलमग्न भूमि को खेती योग्य बनाते समय गाया जाता है जो वर्षभर पानी से भरी रहती है। कठिन परिश्रम के बीच जीवन में उत्साह बनाए रखने का यह अनूठा माध्यम है। इन गीतों में घरेलू जीवन, पारिवारिक रिश्ते, नायिका की प्रेमकथा, सास-बहू और ननद-भाभी के हास्य-विनोद का सुंदर चित्रण होता है। कठिन परिस्थितियों में भी यह गीत श्रमिकों के जीवन में ताजगी और संतोष का संचार करता है।

गीतों में

चांचर

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